एक प्रतीक चिन्ह का जन्म

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इप्टा ( भारतीय जन नाट्य मंच ) की स्थापना 25 मई 1943 में हुई थी. आरम्भ से ही भारतीय प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन में हालाँकि नाटक की एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका रही पर नाटक के स्वतंत्र संगठन के रूप में इप्टा का जन्म कुछ बाद में हो सका. आज जब इप्टा के 75 वर्ष के पूरे होने पर पर प्लेटिनम जुबली मनायी जा रही है तब हमें चित्तप्रसाद की एक बार जरूर याद आती है, जिन्होंने इप्टा का ऐतिहासिक प्रतीक चिन्ह बनाया था जो भारत में प्रगतिशील सांस्कृतिक चेतना और परिवर्तनकामी कलाकारों के सपनों का प्रतिनिधित्त्व करता है.

इप्टा या भारतीय जन नाट्य मंच ने अपने समस्त गतिविधियों का उद्देश्य ‘जनता के  रंगमंच का असली नायक जनता है ‘ (People’s theatre stars the people) के नारे के इर्द गिर्द केंद्रित किया गया था. इप्टा के प्रतीक चिन्ह के केंद्र मे हम उस नायक को अपनी पूरी ऊर्जा के साथ उपस्थित पाते है , जो नगाड़े पर अपनी थापों से एक जरूरी लड़ाई का ऐलान करता हुआ दिखता है. इस प्रतीक चिन्ह से यह भी स्पष्ट समझ में आता है कि यह नायक किसी मायने में ‘कमज़ोर’ नही है और उसने सांस्कृतिक कर्म को अन्याय और शोषण के विरुद्ध अपने युद्ध के हथियार के रूप में चुना है.

मुंबई में 23 मई 1943 को गिरणी कामगार मैदान में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का पहला खुला अधिवेशन का आयोजन किया गया था , जो 1 जून तक चला था. इसी सम्मेलन के मंच पर 22 मई के अपराह्न से प्रगतिशील लेखक संघ का तीसरा अखिल भारतीय सम्मेलन शुरू हुआ और 25 मई को भारतीय जन  नाट्य संघ (इप्टा) की स्थापना हुई. मूल सम्मलेन के मंच की सज्जा महात्मा गाँधी , मुहम्मद अली जिन्ना , जवाहरलाल नेहरू और पी सी जोशी के पोर्ट्रेट से किया गया था , जिन्हें चित्तप्रसाद ने बनाया था । इस तथ्य से हम इप्टा के स्थापना के समय से ही चित्तप्रसाद की भूमिका को जान पाते है।

अपने आरंभिक दिनों से ही इप्टा में अपनी प्रस्तुतियों के पहले नगाड़ा बजा कर नाटक शुरू होने की घोषणा करने का रिवाज़ था. ऐसे ही एक कार्यक्रम के ठीक पहले किसी कारण से जब नगाड़ा नहीं बजा तो अपनी नृत्य प्रस्तुति के लिए पूरी वेशभूषा में तैयार कामरेड शांति बर्धन, ग्रीन रूप से बहार आकर स्वयं ही नगाड़ा बजाने लगे. अपने इस महान कलाकार मित्र की प्रतिबद्धता ने चित्तप्रसाद को गहरे प्रभावित किया था और जिसके चलते उन्होंने नगाड़ा बजाते हुए शांति बर्धन को अपने स्केच बुक में चित्रित किया था.

बाद में यह चित्र कम्युनिस्ट पार्टी की पत्रिका ‘पीपुल्स वॉर’ के 21 जनवरी 1945 के अंक में प्रकाशित हुआ था (चित्र 1 ).  चित्तप्रसाद ने इसी चित्र को आधार बना कर इप्टा का लोगो बनाते हुए अपने मित्र शांति बर्धन को इतिहास में अमर कर दिया (चित्र 2 ). 23 दिसम्बर 1957 से 1 जनवरी 1958 दिल्ली में आयोजित इप्टा के आठवें अखिल भारतीय सम्मलेन में यह लोगो इप्टा की अधिकृत प्रतीक चिन्ह के रुप में सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया था.

इप्टा के 75 वीं सालगिरह पर इप्टा के सभी साथियों को हमारा इंकलाबी सलाम !

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