युवा कविता की एक सजग, सक्रिय और संवेदनशील बानगी है निशांत की कविताएँ

जब भी कोई नई पीढ़ी कविता में आती है तो उसके समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न होता है कि वह अपने से ठीक पहले की पीढ़ी की कविताओं को किस तरह पढ़े. इस पढ़ने में उसकी अपनी अनुपस्थिति जरुरी है या उपस्थिति. कवि का पढ़ना उसका लिखना भी होता है. इस कठिन-कविता के दौर में निशांत ने न सिर्फ अपना अलग मुकाम बनाया है, बल्कि अपने से पहले की पीढ़ी की कविता को पढ़ने का ढब भी विकसित किया है. बेरोजगारी, प्रेम, अकेलापन, संघर्ष और यारबासी- ये कुछ ऐसे विषय है जिससे हर युवा…

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हत्या जिनकी भी हो, पुरजोर विरोध कीजिएः तभी बचेगा समाज, तभी बचेगा देश !

एप्पल कंपनी में मैनेजर के पद पर काम करने वाले विवेक तिवारी को शुक्रवार देर रात गश्त कर रहे उत्तर प्रदेश पुलिस के कॉन्स्टेबल ने लखनऊ में गोली मारकर हत्या कर दी। उत्तर प्रदेश में पिछले 16 महीनों में जबसे आदित्यनाथ की सरकार बनी है, तब से अब तक दो हज़ार से भी ज़्यादा तथाकथित पुलिस एनकाउंटर हुए हैं, जिनमें 58 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। इन मुठभेड़ों में सबसे हालिया मुठभेड़ अलीगढ़ की है जहां पत्रकारों के सामने मुस्तकिम और नौशाद नामक व्यक्ति की हत्या कर दी गई…

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आधार पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय : आने वाला इतिहास असहमति वाले अल्‍पमत निर्णय को ही सही ठहरायेगा

सर्वोच्‍च न्‍यायालय का निर्णय लाखों लोगों को मायूस करने वाला है, क्‍योंकि देश के गरीबों को पीडीएस एवं मनरेगा जैसी जनकल्‍याण की योजनाओं से वंचित करने के लिए आधार का इस्‍तेमाल करने की वैधता प्रदान कर दी गई है. सर्वोच्‍च न्‍यायालय इस इस तथ्‍य को महसूस करने में असफल रहा है कि भोजन या रोजगार का हक़ ऐसे अधिकार हैं जिनसे किसी को भी, किसी भी आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता है. बड़े पैमाने पर मौजूद इस तथ्‍य को भी पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है कि आधार में एनरोलमेण्‍ट कराने को बाद भी 27 प्रतिशत गरीबों को जनकल्‍याण योजनाओं का लाभ नहीं दिया जा रहा है.

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मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी : सर्वोच्‍च न्‍यायालय की निगरानी में एस.आई.टी. द्वारा जांच ही उचित

यह संतोषजनक है कि पुणे पुलिस द्वारा बिना जांच किये ही आरोप लगा कर जेल भेजने की सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने अनुमति नहीं दी और उन्‍हें हाउस अरेस्‍ट में ही रखा, लेकिन बेहतर होता कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय की निगरानी में एस.आई.टी. द्वारा जांच करवाई जाती क्‍योंकि पुणे पुलिस की गतिविधियों में खुद ही कई गैरकानूनी काम हुए हैं, जिन्‍हें कि इस मामले में जस्टिस चन्‍द्रचूड़ ने असहमति वाले अल्‍पमत के निर्णय में चिन्हित किया है.

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98 फीसदी डीटीसी कर्मचारियों ने हड़ताल के पक्ष में वोट डाला

नई दिल्ली. डीटीसी के कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों ने स्ट्राइक बैलट किया और 10 हज़ार 69 वोट हड़ताल के पक्ष में डाल कर संघर्ष और जनवाद का बेहतरीन मॉडल पेश किया है. डीटीसी में लगभग 12 हज़ार कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी काम करते हैं। वे पहले ही असुरक्षित रोजगार और अंडर पेमेंट को झेल रहे हैं। मालिकों की अपील पर हाई कोर्ट द्वारा बढ़ी हुई न्यूनतम मजदूरी को वापस कम करने का निर्णय से उनकी मुसीबत और बढ़ गई है.  इसका बहाना बना कर डीटीसी प्रबंधन ने  सर्कुलर जारी किया जिसके बाद पहले ही…

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भारतीय चित्रकला में ‘कथा’ : 3

वह ‘कथा’ जिसे हम किसी चित्र में चित्रित पाते है , वास्तव में उस कथा से हमारा परिचय चित्र के माध्यम से नहीं बल्कि साहित्य (लिखित या वाचिक) के माध्यम से होता है , चित्र में हम केवल उस व्याख्या के अनुरूप उपस्थितियों को पहचान ही पाते हैं। किसी महापुरुष या देवता की कथा का चित्र में ‘चित्रण’ को हम इसलिए महान मान लेते हैं, क्योंकि हम उस चित्र में उस महापुरुष को उसके रंग , वेशभूषा , अलंकार , मुकुट और उनकी क्रियाओं / ‘लीलाओं’ से पहचान लेते हैं । महज चित्र में किसी परिचित कथा या नायक को किसी स्थापित कथा के अनुरूप पहचान लेना लेना, कभी भी चित्र देखने का तरीका नहीं हो सकता।

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शहीदे आज़म भगत सिंह के जन्मदिन पर हल्द्वानी में भाकपा माले की इंकलाब रैली

भाकपा(माले) ने 28 सितंबर को शहीदे आज़म भगत सिंह के जन्मदिवस पर “इंकलाब रैली” का आयोजन किया। इस रैली में हेतु माले के मजदूर, किसान व महिला संगठनों के सदस्य सैकड़ों की संख्या में अब्दुल्ला बिल्डिंग के समक्ष एकत्रित हुए और वहाँ से लाल झंडों से सुसज्जित रैली ने नारेबाजी करते हुए बुद्ध पार्क की ओर मार्च किया।

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जेल का भय रिश्ते का आधार नहीं, संवैधानिक नैतिकता से बनेगा लोकतांत्रिक समाज

अगर हमारे कानून सामाजिक नैतिकता के आधार पर बनने लगे तो सोचिए कि हमारे समाज का क्या होगा ! क्योंकि सामाजिक नैतिकता तो अक्सर यही कहती है कि जाति के बाहर विवाह अनैतिक है, समलैंगिक रिश्ते रखना अनैतिक है, किसी लड़की का अपनी मर्जी के कपड़े पहनना अनैतिक है, किसी लड़की का अपने लिए बराबरी आज़ादी पाना अनैतिक है, किसी दलित लड़की या लड़के का किसी सवर्ण लड़के या लड़की से प्रेम संबंध अनैतिक है। सामाजिक नैतिकता तो पितृसत्तात्मक और जातिवादी नैतिकता है। और इसीलिए हम सामाजिक नैतिकता की बजाए संवैधानिक नैतिकता की ओर कदम बढ़ाते हैं तो हमारा समाज ज्यादा सुन्दर, ज्यादा लोकतांत्रिक बनेगा । इसकी हमें कोशिश करनी चाहिए।

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भाकपा-माले की पटना के गांधी मैदान में ऐतिहासिक रैली, भाजपा को उखाड़ फेंकने का आह्वान

माले महासचिव ने कहा कि मोदी का साढ़े चार साल तबाही का काल है. मोदी ने कहा था कि बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार, लेकिन मोदी के राज में महंगाई आसमान छू रही है. पेट्रोल व डीजल के दाम ने पुराने सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए हैं. राफेल विमानों की खरीद में अबतक का सबसे बड़ा घोटाला हुआ है. कर्ज में डूबे अनिल अंबानी को मोदी ने राफेल खरीद का ठेका दे दिया, जो जनता के साथ विश्वासघात है. आश्चर्य है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल पर मोदी संसद में नहीं बोल सकते हैं, लेकिन अमित शाह तथा अंबानी-अडानी के साथ बैठक कर बातचीत कर सकते हैं. मोदी राज में किसानों और गरीबों को कर्ज नहीं मिल रहा है लेकिन बड़े-बड़े पूंजीपतियों को लगातार छूटें मिल रही हैं. पूंजीपति हजारों करोड़ रुपये लेकर भाग रहे हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी नरेन्द्र मोदी के ही रास्ते चल रहे हैं.

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असली नक्सलियों के बीच

भाकपा माले खुद को आज भी बदल रही है . इसी महीने 5 सितम्बर को गौरी लंकेश की बरखी पर पार्टी महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य और मैंने एक सम्मेलन को सम्बोधित किया था . बाद में उसी रोज फासिज्म के खिलाफ सड़क पर एक नुक्क्ड़ सभा को भी सम्बोधित किया था . मैंने यही महसूस किया , दीपांकर लकीर के फ़क़ीर बनना नहीं चाहते . उनकी पार्टी एक नए वैचारिक आयाम में प्रवेश करना चाहती है . या उसके लिए पंख फड़फड़ा रही है . माले ने मार्क्सवाद को फुले ,आंबेडकर के विचारों और भगत सिंह के सपनों से मंडित करने की पहल की है . 1990 के दशक में ही इस पार्टी ने ब्राह्मणवाद विरोध को अपनी कार्य सूची में शामिल किया था . आज वह इस पर जोर दे रहे हैं .

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पत्रकारों पर हमले के ख़िलाफ़ कन्वेंशन में पत्रकार सुरक्षा कानून और प्रेस आयोग के गठन की माँग

नई दिल्ली. कमेटी एगेंस्ट एसॉल्ट ऑन जर्नलिस्ट (काज)  द्वारा दिल्ली के कांस्टीट्युशन क्लब ऑफ इंडिया में 22 और 23 सितम्बर को पत्रकारों पर हमले के ख़िलाफ़ दो दिवसीय राष्ट्रीय कन्वेंशन आयोजित किया गया हुआ. इस दो दिवसीय कार्यक्रम में दोनों दिन पूरे समय कार्यक्रम हॉल खचाखच भरा रहा. कार्यक्रम में दूर-दराज के गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों के पत्रकारों का शामिल होना इस कार्यक्रम की अभूतपूर्व सफलता कहा जा सकता है. सम्मेलन में पत्रकार सुरक्षा कानून, पत्रकारों को लीगल सहायता और प्रेस आयोग के गठन की माँग उठी. उद्घाटन सत्र…

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गुरिल्ला इमरजेंसी के दौर में मीडिया : मध्यप्रदेश की कहानी

  भारत में मीडिया की विश्वसनीयता लगातार गिरी है, 2018 विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों की सूची में 2 अंक नीचे खिसकर 138वें पायदान पर आ गया है. कुछ महीनों पहले ही कोबरा पोस्ट द्वारा “ ऑपरेशन 136 ” नाम से किये गये स्टिंग ऑपरेशन ने बहुत साफ़ तैर पर दिखा दिया है कि मीडिया सिर्फ दबाव में ही नहीं है बल्कि इसने अपने फर्ज का सौदा कर लिया है. आज मीडिया के सामने दोहरा संकट आन पड़ा है जिसमें “ऊपरी दबाव” और “पेशे से गद्दारी” दोनों…

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सीएम योगी के हेट स्पीच मामले में न्यायिक लड़ाई लड़ रहे परवेज़ परवाज़ गैंग रेप केस में गिरफ्तार

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के वर्ष 2007 में घृणा भाषण ( हेट स्पीच ) के मामले में न्यायिक लड़ाई लड़ रहे सामाजिक कार्यकर्ता परवेज परवाज को गोरखपुर पुलिस ने 25 सितम्बर की देर रात गिरफ्तार कर लिया। उन्हें इस वर्ष 4 जून को दर्ज कराए गए गैंग रेप के मामले में गिरफ्तार किया गया। इस केस की पूर्व में हुई विवेचना में केस फर्जी पाया गया था और अंतिम रिपोर्ट अदालत को भेज दी गई थी लेकिन अंतिम रिपोर्ट को निरस्त कर इसकी फिर से विवेचना करायी गई जिसमें उन पर आरोप के पर्याप्त सूबत मिलने का दावा करते हुए पुलिस ने गिरफ्तार करने की बात कही है।

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जबरदस्त कवि, बड़े सम्पादक, सिनेमा और संगीत के अध्येता, गंभीर पाठक, भाषाओं और यारों के धनी विष्णु खरे की याद

अशोक पाण्डे अलविदा विष्णु खरे – 1 जबरदस्त कवि, बड़े सम्पादक, सिनेमा और संगीत के अध्येता, गंभीर पाठक, भाषाओं और यारों के धनी उस आदमी की महाप्रतिभा का हर कोई कायल रहा. असाधारण उपलब्धियों और आत्मगौरव से उपजे उनके नैसर्गिक दंभ का भी मैं दीवाना था. उनका दंभ उन पर फबता था. ऐसा कोई दूसरा आदमी अभी मिलना बाकी है जिसके बारे में ऐसा कह सकूं. उनके अद्वितीय जीवन का विस्तार इतना विराट था कि भले-भलों की कल्पना तक वहां नहीं पहुँच सकती. बौनों से भरे साहित्य-संसार दुनिया में वे…

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कल्पना लाज़मी के सिनेमा में एक सशक्त स्त्री की छवि उभरकर सामने आती है

यूनुस खान   कल्‍पना लाजमी का जाना हिंदी फिल्‍म जगत का एक बड़ा नुकसान है। बहुत बरस पहले एक सीरियल आया था ‘लोहित किनारे’। ये दूरदर्शन का ज़माना था। मुमकिन है आपको ये सीरियल याद भी हो। इसका शीर्षक गीत शायद भूपेन हजारिका ने गाया था। असम की कहानियों पर केंद्रित ये धारावाहिक बनाया था कल्‍पना लाजमी ने, और ये कल्‍पना लाजमी से हमारा पहला परिचय था। कल्‍पना लाजमी को मुख्‍यत: ‘रूदाली’ के लिए याद किया जाता है। असल में ‘रूदाली’ ज्ञानपीठ से सम्‍मानित बंगाल की प्रसिद्ध लेखिका महाश्‍वेता देवी…

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मजदूरों को निचोड़ने और फेंकने का काल है यह

आज संगठित और असंगठित, दोनों क्षेत्रों में मजदूरों की दशा, अमानवीयता का सामना कर रही है। अपने देश में ज्यादातर मजदूर असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं और लचर श्रम कानून की सीमा से परे होते हैं । केवल 8-9 प्रतिशत मजदूर ही श्रम कानून के अंतर्गत आते हैं । फिर भी नीति नियंताओं की आंखों का पानी मर चुका है। विशेष दुर्दशा असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की है जिनकी संख्या कुल मजदूरों का लगभग 92 प्रतिशत हैं । संगठित क्षेत्रों में महज 5 प्रतिशत मजदूर हैं। जिस शिकागो सम्मेलन के द्वारा काम के आठ घंटे निर्धारित करने की लम्बी लड़ाई मजदूरों ने लड़ी थी और जिसे आज भी मजदूर दिवस के रूप में पूरी दुनिया में मनाया जाता है, वह बेमानी हो चुका है । आज श्रमिकों से अठारह-अठारह घंटे काम लिया जा रहा है। बदले में किसी प्रकार की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए समय नहीं दिया जा रहा ।

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पत्रकारों के उत्पीड़न के ख़िलाफ़ जनमत तैयार करने के संकल्प के साथ CAAJ कन्वेंशन का समापन

नई दिल्ली. दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन हॉल में 22-23 सितंबर को आयोजित कमेटी अगेन्स्ट असॉल्ट ऑन जर्नलिज़्म (CAAJ) सम्मेलन पत्रकारों के उत्पीड़न के ख़िलाफ़ देश भर में जनमत तैयार करने और इस लिहाज़ से एक प्रभावी तंत्र विकसित करने के संकल्प के साथ सम्पन्न हुआ। इस दो दिवसीय कन्वेंशन को प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया और अंतरराष्ट्रीय साख वाले पत्रकार संगठन ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ (CPJ) का समर्थन हासिल हुआ। इसके अलावा 30 से ज़्यादा पत्रकारिता संस्थानों और जनसंगठनों इसके आयोजन में शिरकत की। दो दिनों तक चार सत्रों में पत्रकारिता और…

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अभिव्यक्ति के प्रति ईमानदार एक रचनाकार की त्रासदी ‘मंटो’

अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ‘मंटो’ बायोपिक फिल्म की बहुत समय से प्रतीक्षा कर रहा था। समय-समय पर आने वाले ट्रेलर या वीडियो के टुकड़े इंतिजार को अ-धीरज में बदल रहे थे। आज वह दिन हाथ लग ही गया। कुछ रचनाकार होते हैं जिनके लेखन के साथ-साथ उनके जीवन का भी आकर्षण किसी को खींच सकता है। यह व्यक्तिगत रुचि का मसला हो सकता है। मेरे लिए तुलसी, कबीर, ग़ालिब, निराला, मंटो जैसे रचनाकार लेखन के साथ-साथ अपने जीवन का भी आकर्षण रखते हैं। उनके लेखन से गुजरने की तरह उनके जीवन…

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जनगीतों का सामाजिक सन्दर्भ

डॉ. राजेश मल्ल   साहित्य अपने अन्तिम निष्कर्षों में एक सामाजिक उत्पाद होता है। कत्र्ता के घोर उपेक्षा के बावजूद समय और समाज की सच्चाई उसके होठों पर आ ही जाती है। ऐसे में जब कविता का मूल भाव समाज परिवर्तन हो तो समाज में निहित द्वन्द्व, अन्तर्विरोध अत्यन्त स्वाभाविक रूप से कविता में घुल-मिलकर प्रवाहित होते हैं। ‘जनगीतों’ का स्वरूप कुछ ऐसे ही बना-रचा हुआ है। सामाजिक अन्तः सम्बन्ध और उनमें निहित असमानता के तनावपूर्ण रूप जनगीतों के मूल विषय हैं। जनगीतों में सर्वाधिक गैर बराबरी तथा शोषण और…

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ज़मीर को हर शै से ऊपर रखने वाले मंटो

अखिलेश प्रताप सिंह. खुदा ज्यादा महान हो सकता है लेकिन मंटो ज्यादा सच्चे दिखते हैं और उससे भी ज्यादा मनुष्य, क्योंकि मंटो को सब कुछ इस कदर महसूस होता है कि शराब भी उनकी ज़ेहन की आवाज को दबा नहीं पाती है. यह फ़िल्म अगर नंदिता दास ने लिखी है और निर्देशित की है और चूँकि यह फ़िल्म मंटो जैसे हिपटुल्ला? व्यक्ति का जीवन चरित है, तो इसे देखना मनोरंजन की चहारदीवारी से आगे की चीज है. दुनिया की सभी सुंदर सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की तरह यह फिल्म दर्शक को अपने…

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