वैज्ञानिक-चित्त की खोज में पूरे जीवन बेचैन रहने वाला एक शिक्षाविद्

यशपाल बराबर इस बात को रेखांकित करते थे कि देश में सभी अपने बच्चों को विज्ञान पढ़ाना चाहते तो हैं किंतु वैज्ञानिक दृष्टि नहीं देना चाहते. बच्चों के आगे समाज की पूरी संरचना विज्ञान के प्रतिकूल है. बगैर दृष्टि और समझ के विज्ञान शिक्षा का मूल्य उनके लिए नहीं था. विज्ञान शिक्षा का मतलब उनके लिये सभी तरह की संकीर्णताओं, कूपमंडूकताओं और क्षुद्रताओं को विज्ञान की कसौटी पर जांचना-परखना है.

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राजेन्द्र कुमार : जैसा मैंने उन्हें देखा

उनका अलंकरण मुश्किल है. उनके बारे में अतिशयोक्ति संभव नहीं. ध्यान से देखें तो उन्होंने अपने जीवन और अपनी रचना में कुछ भी अतिरिक्त, कुछ भी surplus बचाकर रखा नहीं है. जो कुछ भी अर्जित रहा, वह इतने इतने रूपों में बंटता रहा कि कोई चाह कर भी उसका लेखा-जोखा नहीं तैयार कर सकता. सामाजिक सक्रियताओं, लेखकीय प्रतिबद्धताओं, अध्यापकीय और पारिवारिक जिम्मेदारियों के दरम्यान उनका सारा अर्जन मानों खुशबू की तरह बिखर गया है.

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