भाजपा का पानी उतरने लगा है : भाकपा माले

उपचुनाव परिणाम भाजपा के लिए नकारात्मक संदेश देते हैं. बिहार, पंजाब आदि राज्यों में भाजपा के साथ गठबंधन करने वाले दलों के प्रत्याशी भी हार का मजा चखने को बाध्य हुए हैं. यह दिखाता है कि मोदी-योगी सरकार की नीतियों से जनता का भरोसा उठ चुका है और इनकी वादाखिलाफी व महंगाई से लोग परेशान हैं.

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पटना म्यूजियम के निदेशक और मशहूर चित्रकार यूसुफ खान पर हमले की भर्त्सना

पटना, 30 मई. जन संस्कृति मंच, बिहार ने नवनिर्मित पटना म्यूजियम के निदेशक और समकालीन भारतीय कला के प्रमुख चित्रकार यूसुफ खान के साथ मारपीट की घटना की कठोर शब्दों में भर्त्सना की है. जन संस्कृति मंच के राज्य सचिव सुधीर सुमन, जसम पटना के संयोजक राजेश कमल और जसम राष्ट्रीय पार्षद चित्रकार राकेश दिवाकर ने कहा है कि आर्ट काॅलेज में घटी आपराधिक घटनाओं के बाद अब नवनिर्मित पटना म्यूजियम के निदेशक, जो कि एक मशहूर चित्रकार भी हैं, पर संस्थान के ही एक अधिकारी द्वारा हमला किया जाना यह जाहिर…

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पत्थलगड़ी से क्यों भयभीत है राज्य सत्ता

आदिवासियों ने जिस झारखंड राज्य के गठन के लिए सात दशकों तक संघर्ष किया उसी राज्य में अब उन्हें अपनी आजीविका के संसाधनों को सुरक्षित रखने के लिए संघर्ष करना पड़ा रहा है. आदिवासियों को यह बात मालूम हैं कि उनका अस्तित्व बरकरार रखने के लिए उनके पास संघर्ष करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है. यही रास्ता राज्यसत्ता को भयभीत करती है क्योंकि जनांदोलन तथाकथित विकास और आर्थिक तरक्की के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों के लूट पर अड़ंगा लगाता है.

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हिटलर और फ़ासीवाद का नया उभार

सोवियत संघ के पतन और विश्व अर्थतंत्र में आए बदलावों के चलते तेजी से उभरी नवफ़ासीवादी सक्रियता फिलहाल अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की सबसे खतरनाक प्रवृत्ति बन गई है. मार्टिन ए ली की किताब ‘ द बीस्ट रीअवेकेन्स: फ़ासिज्म’स रीसर्जेन्स फ़्राम हिटलर’स स्पाइमास्टर्स टु टुडे’ज नीओ-नाज़ी ग्रुप्स ऐंड राइट-विंग एक्सट्रीमिस्ट्स ’ में इसी बात को समझने की कोशिश की गई है कि पचास साल पहले जो फ़ासीवाद पूरी तरह बदनाम था वह फिर से किस तरह मजबूत बना.

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‘ मृत्युंजय की कविताएं आम अवाम की बेचैनी, क्षोभ, अवसाद, दुख, पीड़ा और गुस्से का इजहार हैं ’

जन संस्कृति मंच की ओर से छज्जूबाग, पटना में युवा कवि मृत्युंजय के काव्यपाठ और बातचीत का आयोजन हुआ. मृत्युंजय ने ‘यां’, ‘नश्वर-सी सुंदरता’, ‘ पिया हाजी अली’ ‘किमोथैरेपी’, ‘अजनबीयत’, ‘शहादत इस फलक के बीच जगमगाती है’, ‘मणिपुर एक तिरछी गड़ी वर्णमाला है राष्ट्र के कलेजे में’ आदि कविताएं सुनाई.

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तिलाड़ी शहादत स्मृति : जंगल, जमीन, पानी पर जनता के अधिकार की लड़ाई जारी है

राजशाही शहीदों के खून के वेग में बह गयी.पर हमारे लोकतंत्र के खेवनहारों ने राजाओं के गुण बखूबी आत्मसात किये. उन्हें जंगल,जमीन,पानी के लिए लोगों का खून बहाना मंजूर है पर संसाधनों पर जनता का अधिकार मंजूर नहीं है. तिलाडी के हमारे बहादुर पुरखों से चली आ रही यह लड़ाई,आज भी जारी है,हत्यारी राजशाही के गुणसूत्र वाले वर्तमान हुक्मरानों से.

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पत्थलगड़ी आंदोलन की जड़ें

आदिवासियों के साथ प्रगति, विकास, जनहित, राष्ट्रहित एवं आर्थिक तरक्की के नाम पर धोखा किया गया है। इसलिए अब वे किसी भी कीमत पर अपनी जमीन, इलाके और प्राकृतिक संसाधनों को काॅरपोरेट को देने के लिए तैयार नहीं हैं। पत्थलगड़ी आंदोलन की जड़ें यहीं हैं।

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त्रासदी बनते इतिहास का आख्यानः मदन कश्यप का काव्य

प्रणय कृष्ण (कवि मदन कश्यप को जनमत टीम की ओर से जन्मदिन की हार्दिक बधाई। इस अवसर पर पढ़िए ‘नीम रोशनी में’ संग्रह पर लिखा गया प्रणय कृष्ण का आलेख और साथ में ही संग्रह की कुछ कविताएं भी) कवि मदन कश्यप द्वारा 1990 के दशक में लिखी कवितायें आज़ाद भारत के सबसे विलक्षण कालखंड के बीच खड़े ‘कालयात्री’ की संत्रस्त सभ्यता-परिक्रमा की द्योतक हैं. नब्बे के दशक , खास कर सन ‘93 से लेकर सन ‘97 के बीच लिखी उनकी कविताओं का प्रतिनिधि संकलन है ‘नीम रोशनी में’ (2000).…

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एक प्रतीक चिन्ह का जन्म

आज जब इप्टा के 75 वर्ष के पूरे होने पर पर प्लेटिनम जुबली मनायी जा रही है तब हमें चित्तप्रसाद की एक बार जरूर याद आती है, जिन्होंने इप्टा का ऐतिहासिक प्रतीक चिन्ह बनाया था जो भारत में प्रगतिशील सांस्कृतिक चेतना और परिवर्तनकामी कलाकारों के सपनों का प्रतिनिधित्त्व करता है.

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तूतीकोरिन हत्याकांड के विरोध में धरना व प्रतिवाद सभा

तमिलनाडु के तूतीकोरिन में काॅरपोरेट परस्त सत्ता द्वारा स्टारलाइट कंपनी के संयत्र द्वारा पैदा किये पर्यावरण व जनजीवन के संकट के विरोध में तथा वहां के नागरिकों के आंदोलन पर पुलिसिया दमन व बर्बर लाठीचार्ज व गोलीबारी के खिलाफ लखनऊ के जनवाद पसंद नागरिकों ने विरोध प्रदर्शन व प्रतिवाद सभा की।

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एक कविता: दोष नहीं कुछ इसमें [अद्दहमाण]

विद्वानों के मुताबिक़ अद्दहमाण [अब्दुल रहमान] का काल 12वीं सदी के कुछ पहले ही ठहरता है। यहाँ कुछ छंद उनके ग्रंथ ‘संदेस–रासक‘ से चुने गए हैं। हर छंद के नीचे उनके काव्यानुवाद की कोशिश की है। ये काव्यानुवाद आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी और विश्वनाथ त्रिपाठी उत्कृष्ट सम्पादित ‘रासक‘ के अर्थों पर आधारित हैं। इसलिए अनुवाद में जो भला वह आचार्यों का, बुराई मेरी। शास्त्रीय भाषा में कहें तो इन छंदों में हमारा यह पुरखा कवि अपनी कविता का ‘औचित्य‘ बताता है। औचित्य बताते हुए वह एक मूलभूत सवाल की ओर…

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मरे हुए तालाब में लाशें नहीं विचारधाराएं तैर रही हैं

“जंगल केवल जंगल नहीं है नहीं है वह केवल दृश्य वह तो एक दर्शन है पक्षधर है वह सहजीविता का दुनिया भर की सत्ताओं का प्रतिपक्ष है वह ” अनुज लुगुन की लम्बी कविता ” बाघ और सुगना मुंडा की बेटी ” का एक अंश। यह चर्चित कविता हमारे समय के आदिवासी संघर्ष और सलवा जुडूम की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। बाघ के साथ आदिवासी का प्रेम और भय का एक जटिल रिश्ता रहा है। लेकिन मानव रूपी बाघों की बात अलग है।वे बाघ के संरक्षण की योजनाएं बनाते…

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इप्टा के 75 साल , पूरे साल चलेंगे आयोजन

भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) लखनऊ ने इप्टा के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में स्थापना दिवस जनगीतों एवं नाटक ‘हवालात’ की प्रस्तुति के साथ मनाया।

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20 साल से नियम-कानून की धज्जियाँ उड़ाती रही है वेदांता

वेदांता समूह की कंपनी स्टरलाइट कॉपर ने 20 साल तक नियम-कानून की धज्जियाँ उड़ायी. इन 20 सालों में केंद्र और राज्य में कई पार्टियां सत्ता में आयी और गयीं लेकिन इस कंपनी का कुछ नहीं हुआ. वेदांता भाजपा और कांग्रेस को मोटा चंदा देता रहा है.

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नक्सलबाड़ी विद्रोह का सांस्कृतिक पक्ष : प्रणय कृष्ण

(नक्सलबाड़ी आन्दोलन  की  51 वीं वर्षगांठ (25/5/18) के अवसर पर नक्सलबाड़ी आन्दोलन के सांस्कृतिक पक्ष पर रौशनी डाल रहें हैं, इलाहा बाद विश्वविद्यालय  में प्राध्यापक और आलोचना के लिए देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार से सम्मानित प्रो. प्रणय कृष्ण) नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह (1967) ने भारत की एक नई कल्पना का सृजन किया जिसने कला, संस्कॄति और साहित्य पर गहरा अखिल भारतीय असर डाला. किसी आंदोलन में उतार-चढ़ाव, आत्म-संघर्ष, निराशा, बिखराव और उत्साह के तमाम मंज़र आते और जाते रह सकते हैं, लेकिन नक्सलबाड़ी से प्रेरित आंदोलनों के भू-राजनीतिक विस्तार से कहीं बड़ा…

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चंद्रबली सिंह ने जनवाद को परिभाषित करने का काम किया

 ‘हमारा समय और चंद्रबली सिंह की आलोचना दृष्टि’ विषय पर लखनऊ में संगोष्ठी  प्रसिद्ध आलोचक चंद्रबली सिंह की पुण्य तिथि पर कैफ़ी आज़मी एकेडमी में ‘हमारा समय और चंद्रबली सिंह की आलोचना दृष्टि’ विषय पर चंद्रबली सिंह स्मृति न्यास, जलेस, जसम और प्रलेस की ओर से संगोष्ठी का आयोजन किया गया। सबसे पहले चंद्रबली सिंह के पुत्र प्रवाल कुमार सिंह ने आये हुए अतिथियों का स्वागत किया। उसके बाद विषय प्रवर्तन करते हुए कथाकार देवेन्द्र ने अपने विद्यार्थी जीवन की तमाम यादों को साझा किया। उन्होंने बताया कि आपातकाल के समय एक…

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जनसंस्कृति की वाहक कला और सपना सिंह की रचना

” द ट्रु आॅफ हाफ वर्ल्ड “ सपना सिंह के, एक चित्रण श्रृंखला का शीर्षक है.  इस तरह के विषय के चयन की परंपरा चित्रकला जगत में लगभग नहीं रही है. बिल्कुल इस सदी में कुछ चित्रकारों ने इस तरह के विषय केन्द्रित चित्रण की शुरुआत की. आम तौर पर कला की शिक्षा देने वाले हमारे विश्वविद्यालय, तमाम रचनात्मक संभावनाओं को विधिवत् कूट पीस कर एक ऐसा ड्राफ्टमैन बना डालते हैं, जिसे अपनी सृजनात्मकता हासिल करने में एक लंबा वक्त लगता है. बल्कि बहुत तो एक टूटपूंजिया कारीगरी में ही…

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मार्क्स और हमारा समय

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी-लेनिनवादी) ने नयी दिल्ली स्थित उर्दू घर में 19 मई के दिन ‘ मार्क्स और हमारा समय ’ शीर्षक से एक आम सभा का आयोजन किया. छात्रों, श्रमिकों, बुद्धिजीवियों और नागरिकों से खचाखच भरे सभागार को राजनीति विज्ञानी प्रो. अचिन विनायक, जानी मानी अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक, प्रसिद्ध पत्रकार उर्मिलेश तथा भाकपा ( माले) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने संबोधित किया.

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सेक्युलर इंडिया से इतनी दिक़्क़त क्यों है ?

डर या लालच के मारे किसी राजनैतिक दल का पिछलग्गू हो जाना या सरकारी भोंपा बन जाना तो समझ आता है, लेकिन क्या अब भारतीय मीडिया के इस धड़े का संपादकीय नागपुर में लिखा जा रहा है.

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एक कविता : मेट्रो-महिमा : वीरेन डंगवाल

नवारुण प्रकाशन से वीरेन डंगवाल की समग्र कविताओं का संग्रह ‘कविता वीरेन’ छपने वाला है जिसमें उनके सभी संग्रहों और उसके बाद की अन्य कविताएँ भी शामिल हैं। उसी संग्रह से एक कविता है: ‘मेट्रो महिमा’। यह कविता न सिर्फ़ वीरेन की काव्य-यात्रा के दिलचस्प पड़ावों को दिखाती है, बल्कि इस दौर में तकनीक और पूँजी के हस्तक्षेप की पड़ताल भी करती है।

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