मजदूर-किसानों और कामकाजी हिस्से की व्यापक एकता भाजपा को परास्त करेगी : दीपंकर भट्टाचार्य

जहानाबाद के गांधी मैदान में भाजपा भगाओ-गरीब बचाओ रैली के साथ खेग्रामस का राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू जहानाबाद. जहानाबाद के ऐतिहासिक गांधी मैदान में 19 नवम्बर को दसियों हजार गरीब-गुरबों, मजदूरों का जुटान हुआ. यह ऐतिहासिक जुटान अखिल भारतीय खेत व ग्रामीण मजदूर सभा के छठे  राष्ट्रीय सम्मेलन के अवसर पर भाजपा भगाओ-गरीब बचाओ रैली के अवसर पर हुआ. जहानाबाद, अरवल, गया और अन्य इलाकों से हजारों की संख्या में आज दलित-गरीब जहानाबाद पहुंचे थे. रैली के पहले भाकपा- माले महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य, माले के वरिष्ठ नेता का. स्वदेश भट्टाचार्य,…

Read More

न्याय के सवाल को छोड़कर सामाजिक सौहार्द की बात ही नहीं हो सकती : प्रो राजीव भार्गव

नई दिल्ली. ‘‘ जिस समाज में किसी एक समूह या समुदाय का वर्चस्व हो, जहां हिंसा, दमन-उत्पीड़न और शोषण हो, जहां असहिष्णुता हर नुक्कड़ पर दिख जाती हो, जहां एक दूसरे के खिलाफ गाली-गलौज होती हो, उसे सौहार्दतापूर्ण समाज नहीं कहा जा जा सकता।’’ राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर और सीएसडीएस से संबंधित इंस्टिट्यूट आॅफ इंडियन थाॅट के निदेशक राजीव भार्गव ने ‘सामाजिक सौहार्द की चुनौतियां’ विषय पर जन संस्कृति मंच द्वारा 17 नवंबर 2018 को गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित सातवें कुबेर दत्त स्मृति व्याख्यान में ये विचार…

Read More

देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय: भारतीय दर्शन में भौतिकवाद के अप्रतिम अध्येता

देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने भारतीय परंपरा मे भौतिकवाद तथा वैज्ञानिक चिंतन प्रणाली पर बहुत ही गहन शोध और लेखन किया है। भारत मे कई पीढियां वैज्ञानिक और पदार्थवादी चिंतन के बारे में डीपी चट्टोपाध्याय के लेखन के जरिये ही परिचित होते रहे हैं।। नास्तिकता और वैज्ञानिकता के इतिहास की पड़ताल के क्रम में उन्होंने मुख्यधारा के वेदांत दर्शन की तार्किक आलोचना विकसित की। उन्होंने यह बताया कि प्रत्ययवाद भारतीय दर्शन की एक मात्र पहचान नहीं है, बल्कि शुरू से ही एक तार्किक विचार प्रणाली यथास्थितिवाद के विरोध में खड़ी रही है। इस प्रक्रिया में उन्होंने लोकायत दर्शन को एक तरह से पुनर्जीवित करने का कष्ट साध्य काम किया जो इनका सबसे महान कार्य है। लोकायत के अलावा चरक और सुश्रुत जैसे प्राचीन भारतीय चिकित्सकों के विषय मे भी इन्होंने महत्वपूर्ण अनुसंधान किया है।

Read More

क्रान्ति आती नहीं, ले आयी जाती है बरक्स कर्तार सिंह सराभा

ग़दर आन्दोलन और भारतीय राष्ट्रीय चेतना के प्रचार-प्रसार के लिए कर्तारसिंह ने ‘ग़दर’ नाम से एक पत्रिका निकालना प्रारम्भ किया, जिसके सम्पादक वह स्वयं बने। यह पत्रिका चार भाषाओं में प्रकाशित होती थी – अंग्रेज़ी, उर्दू, हिन्दी और पंजाबी। पत्रिका साप्ताहिक निकलती थी और इसकी छपाई रात्रि समय गोपनीय प्रेस में की जाती थी। कर्तारसिंह रात के समय इसकी देखभाल करते थे। अमरीका में छपी यह पत्रिका भारत पहुँचती थी और फौरन फौजियों में बाँट दी जाती थी। इससे भारतीय सिपाहियों में बेचैनी फैल गई और वे अपनी मातृभूमि के लिए मर-मिटने को तैयार हो गये। अब अंग्रेज सरकार ने इस पत्रिका पर प्रतिबन्ध लगा दिया। बावजूद पत्रिका छावनियों तक पहुँचता रहा। कई छावनियों से इसकी कापियाँ ज़ब्त की जाती रहीं फिर भी यह सिलसिला क़रीब दो साल तक जारी रहा।

Read More

विभाजन को समझे बिना हल नहीं होगा सौहार्द का प्रश्न

सामाजिक सौहार्द का मतलब केवल शांतिपूर्ण सहअस्तित्व नहीं होता. शांति तो ताकत और दमन से भी कायम की जा सकती है. शांति तो युद्धविराम की भी हो सकती है. शांति तो मजबूरी की भी हो सकती है. पर ऐसी शांतियों के भीतर भीषण अशांतियाँ खौलती रहती हैं. कभी भी फुट पड़ने को आतुर. सौहार्द्र का मतलब है एक दूसरे की जरूरत महसूस करना। अपने अधूरेपन को समझना और महसूस करना कि दूसरे के बिना वो पूरा नहीं हो सकता.

Read More

स्त्री की खुली दुनिया का वृत्त हमारे समक्ष प्रस्तुत करतीं कविताएँ

अच्युतानंद मिश्र निर्मला गर्ग की कविताओं में मौजूद सहजता ध्यान आकृष्ट करती है. सहजता से यहाँ तात्पर्य सरलीकरण नहीं है, बल्कि सहजता का अर्थ है विषय के प्रति साफ़ दृष्टि. ऐसे समय ,जब साहित्य को विमर्शवाद की तंग गली में ले जाने का प्रयत्न व्यापक तौर पर अंजाम दिया जा रहा हो तो साहित्य के इस फैशनेबुल यथार्थ से बचना किसी भी कवि – लेखक के लिए कठिन हो जाता है . खासकर तब जब पूरे शोर के साथ विमर्शवाद को एकायामी यथार्थ की तरह प्रस्तुत किया जा रहा हो.…

Read More

कहानी दो फैसलों की : आसिया बीबी और सबरीमाला

आज दोनों पड़ोसी देशों में कई मामलों मे एक-से हालात हैं। कुछ दशक पहले तक भारत का चरित्र अपेक्षाकृत लोकतांत्रिक, उदार एवं धर्मनिरपेक्ष था किंतु सन् 1990 के दशक से भारत में पाकिस्तान की तरह रूढ़िवाद हावी हो रहा है और राजनीति में धर्म का दखल बढ़ता जा रहा है।

Read More

अखिल भारतीय खेत व ग्रामीण मजदूर सभा (खेग्रामस) का छठा राष्ट्रीय सम्मेलन 19-20 नवंबर को जहानाबाद में

पटना. भाकपा-माले से संबद्ध अखिल भारतीय खेत व ग्रामीण मजदूर सभा (खेग्रामस) का छठा राष्ट्रीय सम्मेलन 19-20 नवंबर को जहानाबाद में होगा. पटना में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए खेग्रामस के राष्ट्रीय महासचिव का. धीरेन्द्र झा ने कहा कि यह सम्मेलन ‘मजदूर-किसानों ने ठाना है, लुटेरी मोदी सरकार को भगाना है’ के केंद्रीय नारे के साथ हो रहा है. सम्मेलन के अवसर पर जहानाबाद के गांधी मैदान में भाजपा भगाओ-गरीब बचाओ रैली भी आयोजित होगी, जिसे भाकपा-माले के महासचिव काॅ. दीपंकर भट्टाचार्य मुख्य वक्ता के बतौर संबोधित करेंगे.…

Read More

‘ स्‍वच्‍छ भारत अभियान मोदी का एक और जुमला है ’

राष्‍ट्रीय कन्‍वेंशन में जंतर मंतर पर जुटे देश भर के सफाई कर्मचारी नई दिल्ली. जंतर मंतर पर 16 नवम्बर को देश भर के सफाई कर्मचारियों ने राष्‍ट्रीय कन्‍वेंशन का आयोजन किया. इसमें बिहार, कर्नाटक, तमिलनाडु, छत्‍तीसगढ़, उड़ीसा, उत्‍तर प्रदेश, दिल्‍ली सहित अन्‍य राज्‍यों से सफाई कर्मचारियों ने भागीदारी की. सफाई कर्मचारियों के अलावा भकपा (माले) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य, एपवा की राष्‍ट्रीय सचिव कविता कृष्‍णन जैसे नेताओं ने भी सफाई कर्मचारियों की मांग का समर्थन करते हुए कन्‍वेंशन में भागीदारी की. प्रख्‍यात पत्रकार भाषा सिंह ने भी कन्‍वेंशन में अपनी…

Read More

‘रा’ से राम, ‘रा’ से राफेल

आर एस एस न राम को छोड़ रहा है और न कांग्रेस राफेल को। दोनों ‘राम’ और ‘राफेल’ को कस कर पकड़े हुए है। अगले वर्ष लोकसभा का चुनाव है जिसमें राम सबसे बड़े हथियार हैं। राफेल तो है ही। राम मन्दिर दीवानी मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में वर्षों से लम्बित है। 29 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने सुनवाई का समय बढ़ा दिया है और जनवरी 2019 में इसके लिए बेंच बनाने की बात कही है जो सुनवाई की तिथि तय करेगी। इसके पहले 18 अक्टूबर को…

Read More

नेहरू की छवि के साथ खिलवाड़ छद्म इतिहास निर्माण की कोशिश है

रमा शंकर सिंह यह इतिहास की बिडम्बना है कि जिस जवाहरलाल नेहरु ने जीवन भर इतिहास पढ़ा, लिखा और इससे बढ़कर इतिहास बनाने का काम किया, उसी नेहरु को हमारे समय में निरादृत होना पड़ा है, विशेषकर उसके अपने देशवासियों से ही- उन देशवसियों से जिन्हें वे बेपनाह मोहब्बत करते थे. उनकी यह मोहब्बत उनके पूरे जीवन, कर्म और विचार में व्याप्त है. नेहरु ने जो कुछ भी लिखा, बोला और किया- वह सब प्रकाशित है. इस सबके बावजूद उन्हें दुष्प्रचार का सामना करना पड़ा है. पहले तो उनके व्यक्तित्व…

Read More

एक तरफ ‘ स्वच्छ भारत ‘ का ढोंग दूसरी तरफ हर 3 दिन में एक सफाईकर्मी की मौत

उर्मिला चौहान पूरे देश मे सफाई कर्मचारियों की हालत दिन पर दिन और खराब होती जा रही है। विडम्बना तो ये है कि 2014 में जब मोदी सरकार द्वारा ‘स्वच्छ भारत मिशन’ की घोषणा की तब से अब तक सैकड़ों मजदूर सीवरों और गटर की भेंट चढ़ चुके हैं। ‘सफाई कर्मचारी आन्दोलन’ द्वारा किये गये सर्वे के अनुसार, हर तीसरे दिन पर एक मजदूर की मौत होती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अकेले 2017 में 300 सफाई कर्मचारियों की जाने गयी। पिछले सितंबर-अक्टूबर में दिल्ली शहर के ही सीवर के…

Read More

मोदी सरकार द्वारा किसानों के साथ धोखाधड़ी के खिलाफ किसानों का “ दिल्ली मार्च ” 29-30 नवम्बर को

अखिल भारतीय किसान महासभा नई दिल्ली. 2014 के लोकसभा चुनाव में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी भाजपा ने देश के किसानों से कर्ज माफी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के अनुरूप फसलों का डेढ़ गुना दाम देने का वायदा किया था. यही नहीं उन्होंने देश के लोगों को अच्छे दिन लाने का वायदा भी किया था. पर अपने साढे चार साल के शासन में इस सरकार ने न सिर्फ देश के किसानों के साथ खुला धोखा किया बल्कि अपनी कारपोरेट परस्ती के कारण आज देश को आर्थिक कंगाली…

Read More

भारतीय संवैधानिक अदालतें और धर्मनिरपेक्षता (भाग-1)

 इरफान इंजीनियऱ   पिछले कुछ वर्षों से, परंपराओं और रीति-रिवाजों के नाम पर, भारत में धर्मनिरपेक्षता को पुनर्परिभाषित करने और उसकी सीमाओं का पुनः निर्धारण करने का चलन हो गया है। संविधान निर्माताओं ने एकमत से न सही, परंतु बहुमत से धर्मनिरपेक्षता को संविधान का अविभाज्य और अउल्लंघनीय हिस्सा बनाया था। स्वाधीनता के बाद के वर्षों में इस सिद्धांत का लगभग पूर्णतः पालन किया गया और धार्मिक संस्थाओं और धार्मिक नेताओं के प्रभाव और उनकी शक्तियों में शनैः-शनैः कमी लाई गई। सुधार हुए और समुदायों पर धार्मिक नेताओं और संस्थाओं…

Read More

मुक्तिबोध मेरे लिए -अच्युतानंद मिश्र

अच्युतानंद मिश्र फ़िराक ने अपने प्रतिनिधि संग्रह ‘बज़्मे जिंदगी रंगे शायरी’ के संदर्भ में लिखा है, जिसने इसे पढ़ लिया उसने मेरी शायरी का हीरा पा लिया .इस तरह की बात मुक्तिबोध के संदर्भ में कहनी कठिन है. इसका बड़ा कारण है कि मुक्तिबोध का समस्त लेखन किसी भी तरह की प्रतिनिधिकता के संकुचन में फिट नहीं बैठता. मुक्तिबोध सरीखे लेखकों को जब हम प्रतिनिधि रचना के दायरे में रखकर देखने की कोशिश करते हैं तो एक बड़ा आयाम हमसे छूटने लगता है. यही वजह है कि स्वन्तान्त्रयोत्तर हिंदी लेखन…

Read More

मुक्तिबोध आस्था देते हैं मुक्ति नहीं

प्रियदर्शन मुक्तिबोध और ख़ासकर उनकी कविता ‘अंधेरे में’ पर लिखने की मुश्किलें कई हैं। कुछ का वास्ता मुक्तिबोध के अपने बेहद जटिल काव्य विन्यास से है तो कुछ का उनके मूल्यांकन की सतत चली आ रही कोशिशों से, जिनमें कुछ बहुत सरल हैं कुछ बहुत जटिल, कुछ बहुत साधारण हैं कुछ वाकई असाधारण। मुक्तिबोध के निधन के बाद उनके समकालीनों और समानधर्मा लेखकों ने जिस आत्मीयता, अधिकार और प्रामाणिकता से उन पर लिखा है, वह भी किसी नए लिखने वाले की एक मुश्किल है। और जो सबसे बड़ी मुश्किल है,…

Read More

अंतःकरण और मुक्तिबोध के बहाने

(मुक्तिबोध के जन्मदिन पर समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय का आलेख) 2017 में मुक्तिबोध की जन्मशताब्दी गुज़री है और 2018 मार्क्स के जन्म की द्विशाताब्दी है। मुक्तिबोध की रचना और विश्वदृष्टि का मार्क्स की विश्वदृष्टि से गहरा नाता है। यह जोर-शोर से प्रचारित किया जा रहा है कि मार्क्स को गुज़रे 200 वर्ष हो गए, दुनिया कहाँ से कहाँ चली गई, वे अब पुराने पड़ गए। अब मार्क्सवाद प्रासंगिक नहीं रहा। भारत में तो सत्तारूढ़ दल उन्हें यह कह कर भी नकार रहे हैं कि मार्क्स विदेशी थे…

Read More

आधुनिक सभ्यता-संकट की प्रतीक-रेखा (मुक्तिबोध और स्त्री-प्रश्न)

मुक्तिबोध जयंती पर विशेष   स्त्री स्वाधीनता और उस स्वाधीनता की अभिव्यक्ति के प्रश्न को जितनी गहनता और विस्तार मुक्तिबोध-साहित्य में मिला वैसा हिन्दी साहित्य के पुरुष रचनाकारों में अन्यत्र दुर्लभ है. मुक्तिबोध ‘ अस्मिता-विमर्श ’ के दायरे में इस प्रश्न को संबोधित नहीं करते या कहें कि उनके लिए ऐसा करना संभव न था, लेकिन स्त्री-अस्मिता को उन्होंने कहीं भी अन्य किसी महाख्यान का अधीनस्थ भी नहीं बनने दिया. हिन्दी समाज और साहित्य में स्त्री को न केवल पारम्परिक रिश्तों और आदर्शों के खांचों में खुद को ढाल कर…

Read More

जनसंवाद चौपाल में जोशीमठ नगरपालिका चुनाव के प्रत्याशियों ने रखी अपनी बात

उत्तराखंड में नगर निकायों के चुनावों का प्रचार चल रहा है. 18 नवंबर को तीन नगर निकायों – श्रीनगर(गढ़वाल), रुड़की और बाजपुर को छोड़ कर, प्रदेश के अन्य निकायों में चुनाव होंगे. इन तीन निकायों में चुनाव न होना राज्य सरकार की दक्षता और कुशलता का एक और नमूना है. इस पर विस्तार से अन्यत्र बात होगी. आम तौर पर प्रचार तो ऐसी ही चल रहा है कि सबको देखा बारी-बारी,अबकी बार फलाने भाई की बारी या फिर सारे ही प्रत्याशी-सुयोग्य,कर्मठ,ईमानदार हैं- उनके भौंपुओं के शोर में. लेकिन भौंपुओं के…

Read More

घर की सांकल खोलता हुआ कवि हरपाल

बजरंग बिहारी   कविता जीवन का सृजनात्मक पुनर्कथन है। इस सृजन में यथार्थ, कल्पना, आकांक्षा, आशंका और संघर्ष के तत्व शामिल रहते हैं। रचनाकार अपनी प्रवृत्ति, समय के दबाव और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप इन तत्वों का अनुपात तय करता है। विचार जीवन से आगे बढ़े हुए होते हैं। जीवन की गति स्वाभाविक रूप से धीमी होती है। कवि भावों के लेप से विचार और जीवन में सामंजस्य बैठाने का प्रयास करता है। यह कवि के विवेक पर निर्भर करता है कि वह जीवन और विचार में किसे प्रमुखता दे। ऐसा…

Read More