‘ स्वायत्तता’ का आगमन अर्थात अकादमिक संस्थानों को दुकान में तब्दील करने की तैयारी

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(दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर  उमा राग का यह लेख  ‘  द वायर ’ में  29 मार्च को प्रकाशित हुआ  है )

 

हम से छीन लिया गया
कॉपी कलम किताब
कैद कर लिया गया
हमारे सपने को
फिर हम से कहा गया
तुम स्वायत्त हो
हमारे अधिकारों को छीनने के लिए
उन्होंने एक नया शब्द गढ़ा है ‘स्वायत्तता’
जैसे उन्होंने कभी अंगूठा काटने को कहा था
‘ गुरु दक्षिणा ‘

प्रदीप कुमार सिंह

कितनी सच है यह पंक्ति कि हमारे अधिकारों को छीनने के लिए ही अक्सर सत्ता नए-नए शब्द, नए-नए नारे और जुमले गढ़ती है. इस बार यह हमला हमारे पढ़ने के अधिकार पर है. हमले के लिए जिस अस्त्र का इस्तेमाल होना है वह है ‘स्वायत्तता’ का. मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने देश के 62 विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को ‘ऑटोनोमस विश्वविद्यालय’ का दर्ज़ा देने की घोषणा की है जिसमें 5 केन्द्रीय विश्वविद्यालय भी हैं. ‘ऑटोनोमस’ शब्द सुनने में कितना ही तो अच्छा लगता है जिसका अर्थ है ‘स्वायत्तता’ पर इस संदर्भ में बात जब उच्च शिक्षा की हो रही हो तो ज़रा सतर्क हो जाने की ज़रूरत है.

दरअसल ‘स्वायत्तता’ के पीछे व्यापक रूप से सभी सरकारी अकादमिक संस्थानों को निजीकरण के हवाले कर देने की वृहत्तर योजना काम कर रही है. जिसका सीधा-सा अर्थ है कि इन स्वायत्त संस्थानों में सेल्फ-फाइनेंसड कोर्सेज की बाढ़ आएगी, जिसके पास जितना पैसा होगा वह उतना ही बढ़ियाँ कोर्स (जॉब दिलाने में कारगर) पढ़ पायेगा. ‘स्वायत्तता’ नीतिगत स्तर पर आर्थिक रूप से कमज़ोर तबकों से आने वाले छात्रों,  एससी, एसटी, ओबीसी और महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने के उनके बुनियादी हक़ को उनसे छीनना है. अतः देश की बहुसंख्यक आबादी उच्च शिक्षा के दायरे से बाहर हो जाने वाली है. ये समाज के वे हिस्से हैं जो परंपरागत रूप से शिक्षा और रोज़गार के अवसरों से बाहर रहे हैं. इतना ही नहीं ‘स्वायत्तता’ की इस परियोजना के तहत शिक्षकों को हमेशा-हमेशा के लिए कॉन्ट्रैक्चुअलाईज़ेशन(ठेकेदारी प्रथा)की ओर ढकेल दिया जायेगा. जहाँ एक शिक्षक के रूप में उनके अधिकारों का दायरा बहुत ही संकुचित होगा.

‘स्वायत्तता’ के नाम पर कहा जा रहा कि अब स्वायत्त संस्थानों को नए कोर्स स्ट्रक्चर शुरू करने की अनुमति के लिए यूजीसी के पास नहीं जाना होगा. यहाँ प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि राज्य और केंद्र के अंतर्गत आने वाले सभी विश्वविद्यालयों की स्थापना राज्य विधायिका/संसद के अधिनियम के तहत हुई थी इनके पास हमेशा से अपने पाठ्यक्रमों को बनाने की स्वतंत्रता रही है. विदेशी अकादमिक संस्थानों के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर करने और अकादमिक सम्बन्ध बनाने कि आज़ादी रही है. तो आख़िर इसके लिए ‘स्वायत्तता’ कि आड़ लेने कि ज़रुरत ही क्यों पड़ी ?
सरकार ‘स्वायत्तता’ का तर्क देकर दरअसल उच्च शिक्षा से अपने हाथ खींचने की फ़िराक में है. निश्चित तौर पर उच्च शिक्षा को बाज़ार के लिए खोल देने की मंशा तो प्रमुखता से इसके पीछे काम कर ही रही है. वास्तव में ‘स्वायत्तता’ उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजीकृत अकादमिक संस्थानों के युग के आगाज़ का संकेत है.

वैसे जावड़ेकर जी के पास इन बढ़ी हुई फीसों को कैसे अदा किया जा सकेगा इसका भी जवाब है, वे छात्रों को बैंक लोन दिलवाने की व्यवस्था करवाने वाले हैं. छात्र-आन्दोलन की एक बहुत पुरानी मांग है जो एक नारे के रूप में भी काफ़ी प्रचलित हुई “ शिक्षा पर कितना खर्चा हो/ बजट का दसवां हिस्सा हो ” अगर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएँ तक सरकार मुहैय्या कराने से अपना पल्ला झाड़ रही है तो इस पर आवाज़ उठाने की ज़रुरत है, नहीं तो हमारे छात्र जब विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट होकर निकलेंगें तब केवल उनकी आँखों में भविष्य के सपने ही नहीं होंगें बल्कि उनके कन्धों पर क़र्ज़ का बोझ भी होगा. प्रस्तावित स्वायत्त विश्वविद्यालयों के लिए भी जावड़ेकर जी ने एक व्यवस्था दी है, इस जिन्न का नाम है एचइएफए जो मिनटों में आपकी शिक्षा पर होने वाले ख़र्च का हल ला सकता है, पर दोस्तों इस जिन्न को जितनी जल्दी हो सके बोतल में बंद करके हिन्द महासागर में फेंक देने की ज़रूरत है. एचइएफए विश्वविद्यालयों को अपना इन्फ्रास्ट्रक्चर चलाने के लिए लोन देगा और जिसे चुकाने के लिए ये संस्थान छात्रों की फीसें बढ़ाएंगे. अंततः पिसेंगें बेचारे छात्र ही.

‘ स्वायत्तता ’ का शिक्षा की गुणवत्ता से,पढ़ने और पढ़ाने की स्वतंत्रता से कतई कोई सम्बन्ध नहीं है. बल्कि अपने मूल चरित्र में यह बराबरी और उच्च शिक्षा तक हर ख़ास-ओ-आम की पहुँच के बुनियादी मूल्य का हनन है. ‘स्वायत्तता’ के आगमन के साथ-साथ अब अकादमिक संस्थान दुकानों में तब्दील कर दिए जायेंगें जहाँ बाज़ार की ज़रूरतों के अनुरूप कोर्सेज को गढ़ा जायेगा और उसी के अनुसार उनकी फीसें तय होंगीं. किसी के ज़ेहन में ये सवाल उठ ही सकता है कि आख़िर बाज़ार के अनुसार कोर्सेज को ढालने में बुराई ही क्या है ? पर क्या हम नहीं जानते कि तमाम सरकारी उच्च शिक्षण संस्थानों ने लम्बी अवधि में जो पहचान बनायी है उसे निजी हाथों में सौंप देना कितना भयावह हो सकता है. प्राइवेट संस्थान प्रॉफिट मोटिव से काम करने वाले संस्थान होते हैं. इन पर किसी यूजीसी/एमएचआरडी का कोई दबाव या नियंत्रण काम नहीं करेगा. तब इनकी जन-पक्षधरता को बनाये रख पाना लगभग असंभव होगा. दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि सरकारी संस्थानों पर तो जन दबाव काम करता है पर क्या इन निजी संस्थानों में ठीक उसी प्रकार छात्र-वृत्ति और आरक्षण सम्बन्धी नियमों का पालन हो पायेगा जो उच्च शिक्षा को सभी के लिए समान रूप से सुलभ कराने में कारगार भूमिका निभाता आया है ?

इस सबके साथ एक बहुत बड़ा ख़तरा मौजूदा कोर्सेज पर भी मंडरा रहा है. निश्चित तौर पर सेल्फ-फाइनेंस्ड कोर्सेज की इस भीड़ में वे तमाम पाठ्यक्रम जो अभी तक शिक्षा के ‘ज्ञान के प्रसारण’ ‘सामजिक चेतना’ आर मनुष्य को समाज के लिए एक बेहतर इकाई के रूप में परिष्कृत करने के अपने वृहतर उद्देश्य को सर्व कर रहे थे वे या तो समेट दिए जायेंगें या फ़िर इस गला-काट प्रतियोगिता की होड़ में ख़ुद ही दम तोड़ देंगें. वाणिज्य, अर्थशास्त्र इत्यादि जैसे विषय फिर भी टिक पायेंगें पर समाज विज्ञान, साहित्य और मानविकी के अन्य विषय जो सीधे-सीधे बाज़ार और उसकी ज़रूरतों से नहीं जुड़ते, उनका क्या होगा ? ‘स्वायत्तता ‘ दरअसल ‘ज्ञान’ और ‘शिक्षा’ की इसी बुनियादी अवधारणा पर कुठाराघात है. क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल बाज़ार के लिए मजदूर पैदा करना है ? आज इन्हीं प्रश्नों से हमें दो-चार होने की ज़रुरत है.

आइये थोड़ा और विस्तार से जानते हैं कि ‘स्वायत्तता’ के इस पैकेज में हमारे लिए और क्या-क्या है –
• सभी ‘स्वायत्त’ विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को I/II/III के क्रम में तीन श्रेणियों में बांटा जायगा. जिन संस्थानों को नैक सर्वे में 3.5 या उससे अधिक अथवा एनआईआरएफ द्वारा 50 तक की वरीयता में स्थान मिला है वह श्रेणी I के अंतर्गत रखे जायेंगें. वे संस्थान जिन्हें निक द्वारा 3.01 से लेकर 3.49 तक का स्कोर मिला है अथवा एनआईआरएफ द्वारा 51-100 तक की वरीयता वाले संस्थानों को श्रेणी II में रखा जायेगा. इसके अतिरिक्त शेष संस्थान श्रेणी III में रखे जायेंगें.
• श्रेणी I में आने वाले केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को ‘स्वायत्तता’ प्राप्त करने के लिए विशेषज्ञ समिति के अनुमोदन तक की आवश्यकता नहीं होगी.
• प्रत्येक शिक्षक का वेतन और उसकी सेवा शर्तें प्रबन्धन द्वारा वैयक्तिक तौर पर तय की जायेंगीं.
• प्रबंधन के पास ये अधिकार होगा कि वह कुल संकाय के 20% पद विदेशी शिक्षकों को दे सकता है और इतना ही नहीं उनका वेतनमान अधिक होगा जिसे उनकी मांग के अनुरूप बढ़ाया भी जा सकेगा. यह वेतन स्वायत्त संस्थान को अपने ही स्रोतों से प्राप्त करना होगा. छात्रों कि कुल सीटों का 20% भी विदेशी छात्रों को दिया जा सकेगा, जिसके लिए उनसे मनमानी फीस भी वसूली जा सकेगी.

‘स्वायत्तता’ के रूप में उच्च शिक्षा जगत पर ये अभी तक सबसे बड़ा हमला होगा. यह ज़रूरी है कि इसका जन-विरोधी चेहरा जल्द से जल्द जनता के सामने उजागर हो जाये. उच्च शिक्षा के वर्तमान और भविष्य पर इस हमले की आहट पाकर दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (DUTA) समेत देश भर के शिक्षण संस्थान और छात्र समुदाय आज सड़कों पर हैं. शिक्षा पर हमला समाज की बुनियाद पर हमला है, यह ज़रूरी है कि आम लोग भी इस लड़ाई में साथ आयें और इसे मज़बूत करें. हमला बर्बर है दोस्तों लड़ाई भी तीख़ी होनी होगी !!

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