स्मृति का गांव बनाम रियल पिक्चर

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ओंकार सिंह

गांव की बात जेहन में आते ही एक पुर सुकून सा मंजर दिमाग में तैरने लगता है. खेत-खलिहान और इनके बीच दूर तक दौड़ती पगडंडियां. पोखर और बाग की अलमस्ती या फिर आंगन से सीवान तक सुबह-शाम की चकल्लस . ये सब मिलकर भागदौड़ की जिंदगी में मानो एक ख्वाबों की झुरझुरी भर देते हैं. ओह, गांव तो यही है पर हकीकत में यही नहीं.

सच में, घर के सहन से लेकर सीवान तक ठीक उसी तरह सिमट चुके हैं जैसे टोला पड़ोसी के व्यवहार. आगंतुक की पहले पहल अगुआनी करने वाली कड़ी में बाग व पोखर तो लगभग अतीत बन चुके हैं. अब तो- ‘ का हो, का हाल बा… कब अईला बाबू? ‘ जैसे तपाक से उठने वाले सवाल भी सुनने को नहीं मिलेंगे.  बरबस ही याद आते हैं करीब दो दशक पहले का वो दौर जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में स्नातक परीक्षाओं के आखिरी पेपर के वक्त सभी परीक्षार्थियों में परीक्षा के तनाव की जगह सिर्फ गांव जाने का खुमार छाया रहता था. सबकी जुबान पर यही सवाल- का हो गांवें चलेके बा… कौने ट्रेन से चलबा ? और इस उल्लास में पिछले पेपर भले ही गड़बड़ हुए हों , आखिरी सबका चकाचक हो जाता था.

गांव के यही होने और नहीं होने के बीच गांव का बदस्तूर मरना जारी है. कंक्रीट की पतली रेखाओ से आड़ी तिरछी घिरती आबादी. पक्के आवास, रंग बिरंगे बल्ब व छत पर लगी छतरियां,  ये सब जरूर अब गांव के हिस्से के विकास/उपलब्धि का एहसास सा कराते दिखते हैं  पर एक अहम सवाल, आखिर यह सबकुछ किस कीमत पर ? शायद इसी का जवाब गांव के यही होने और न होने का रहस्य छिपाए हुए है.

जब शहर में शहर सा जीवन जीने का आलम नहीं तो गांव के कस्बानुमा हो जाने का गुमां क्या.  वो भी तब जब गांव की मौलिक गृहस्थी ही खत्म हो चुकी हो. स्वदेशी राग के पीछे कारपोरेटी दहाड़ में ग्रामीण कुटीर धंधे कब के दम तोड़ चुके. पक्के मकानों में गंवई आबोहवा कैद सी होती गई. कहां तो गुड़-मट्ठे और चना-चबैना की नहारी (नाश्ता) व तीसर पहरी में खलिहान व बागों की वास्तविक दुनिया की जद्दोजहद.  कहां चाय-बिस्कुट व पैकेट बंद चिप्स-कुरकुरे की आमद में टीवी की दुनिया की आभासी अभिलाषा.  उस पर भी स्किल इंडिया का बुलंद परचम. जहां मेहनत-मशक्कत करने वाले युवा गांव की दुश्वारियों से पलायित हो देश के कोने-कोने का खाक छान रहा है। फिर भी ऐसा कोई स्किल उनके हाथ नहीं लगता कि वह गांव में ही रहकर अपना पेट पाल सकें. गांव से ही मेहनत है, मजदूर हैं, किसान हैं. पर कितना अजीब है कि यही सब पलायित हैं क्योंकि यहां न काम है, न मजदूरी है और न जीविकोपार्जन के साधन.

ऐसा भी नहीं है कि पारंपरिक गांवों में सब अच्छा ही था और आधुनिक होते गांव में सब बुरा. बुरी तो वह मंशा है जो दोनों दौर के बीच बदलाव का का ढोंग रच रही है. नारों और बयानों में गांव, गरीब, शोषित और किसानों का रहनुमा बनने वालों ने जातीय व सांप्रदायिक राजनीति में इनकी पहचान को ही अबूझ बना डाला. कहां तो विविधता भरे ग्रामीण समाज को वैज्ञानिक व तकनीकी आधार पर सामाजिक समरसता के सांचे में ढालना था. उनको उनके पारंपारिक परिवेश में स्वनिर्भर बनाना था.  कहां सत्ता की उछलकूद के हिसाब से जाति, धर्म व संप्रदाय के आधार पर गरीब गरीबी और किसान की परिभाषा गढ़ने की होड़.  मनरेगा, बीपीएल व ऐसे तमाम कल्याणकारी योजनाओं मेंं मानक गढ़ने के हैरतंगेज कारनामें गांवों में देखने को मिलते हैं.

वाकई, सत्ता विकेन्द्रण के निचले पायदान पर पंचायती राज का आधुनिक गांव जटिल राजनीति और लूट-खसोट की बेहतर बानगी है जहां स्थानीय सत्ता व स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से ग्रामसभा की जमीनों, पोखरों की बंदरबांट और चकरोडों व आम रास्तों पर कब्जा जमाने की अंधेरगर्दी कायम है.  जिसने न सिर्फ गांव के गांवपन को हड़प लिया बल्कि गंवई भोलापन को समझदार बनने से पहले कुटिल और स्वार्थी बना दिया.  और अब रही-सही कसर उनकी अल्हड़ कर्मठता को बर्बरता की ओर ले जाने की है.

सच में, कोई भी एक औसत गांव पतेली की उस एक चावल की तरह हो गया है जिसे टो (दबा कर) कर पूरे देश की हकीकत से वाकिफ हुआ जा सकता है. अमूमन किसी गांव से जुड़ी खेतीबाड़ी पर एक-आध फीसदी का हक हुकूक होता है.  बाकी की रिहाइश मेहनत मजदूरी वालों की होती है. तीन-चौथाई मामले इसी हिस्से से जुड़े होते हैं. करीब 90 फीसदी लफड़े-झगड़े नाली, निकास, सहन व आम रास्तों को लेकर होते हैं.  मजेदार कि इसमें आला दर्जे की सियासत होती है. थाना कचहरियों का टूल्स की तरह इस्तेमाल होता है ताकि मेहनत मशक्कत करने वालों का इस्तेमाल हो सके और फिर वो वोट बैंक के रूप में हथियार बन सकें। गांव से मजदूर तबका या फिर छोटे काश्तकारों के पलायन का यह दुर्व्यवस्था भी बड़ा कारण है.

वैसे ये मसले इतने जटिल भी नहीं कि इनका समाधान न हो सके.  मायावती शासन काल के कुछ व्यावहारिक निर्णय इस मामले में काबिले तारीफ हैं. चयनित अंबेडकर गांवों में आरसीसी सड़कों का निर्माण, सफाई कर्मियों की भर्ती व खाली जमीन को अंबेडकर पार्क के रूप में संरक्षित करना.

बहरहाल, मामला साफ है. विकास की संजीवनी सुविधाभोगियों के लिए है. दुश्वारियों में जी रहे लोग मरते रहें. गांव, गरीब, किसान अभी जिंदा रहेंगे लेकिन नारों में.  क्योंकि ये वोट बैंक हैं. इनके मरने तक विकास की बातें होंगी. विकास जैसा महसूस भी होगा लेकिन विकास की गंगा बहेगी उन जिंदा पितरों को तारने के लिए जो निचले क्रम मेंं इस खेल के सहयोगी हैं.  इसीलिए गांव तो यही हैं पर हकीकत में यहीं नहीं। हां, नारा लगता रहे- जय गांव, जय किसान और जय जवान।

(लेखक न्यूजफाक्स में सब एडीटर हैं)

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