विज्ञान से बैर की वैचारिकी

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28 फरवरी को प्रसिद्ध नोबल पुरुस्कार विजेता सी.वी.रामन के जन्मदिन को भारत में विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता.इस बार इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी में आयोजित विज्ञान दिवस के आयोजन के उद्घाटन के लिए अकादमी द्वारा केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री सत्यपाल सिंह को आमंत्रित किया गया था.

सत्यपाल सिंह मुंबई पुलिस के कमिश्नर रहे हैं.वे बागपत से भाजपा के टिकट पर जीत कर लोकसभा पहुंचे हैं और पिछले वर्ष सितम्बर में  केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री पद से नवाजे गए.इस वर्ष जनवरी में उन्होंने डार्विन के उद्विकास के सिद्धांत को खारिज करने का ऐलान करते हुए काफी सुर्खियाँ बटोरी.इसलिए जब उन्हें विज्ञानं दिवस के समारोह के उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया गया तो इस बात पर भी काफी सवाल खड़े हुए.स्वयं उन्होंने उक्त समारोह में उद्विकास सम्बन्धी सवालों का कोई जवाब नहीं दिया.इसी कार्यक्रम में उद्विकास पर आयोजित व्याख्यान में भी वे शामिल नहीं हुए.

सत्यपाल सिंह के विज्ञान दिवस के उद्घाटन किये जाने पर उठाये जा रहे सवालों के बीच एक खबर यह आई कि मंत्री महोदय ने कैब (शिक्षा पर केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड) की बैठक में न्यूटन के गति के नियमों को भी चुनौती देते हुए कहा कि ये नियम तो हमारे मंत्रो में न्यूटन द्वारा खोजे जाने से कहीं पहले से मौजूद थे.इस तरह देखें तो जो मंत्री विज्ञान महोत्सव का उद्घाटन कर रहे हैं,वो ही आधुनिक विज्ञान और उसके प्रमुख वैज्ञानिकों को दिए हुए सिद्धांतों को वे बिना किसी तर्क संगत आधार के खारिज करते नजर आ रहे हैं.यह भी हैरत की बात है कि ऐसे अवैज्ञानिक रुख वाले मंत्री को विज्ञान दिवस का उद्घाटन करने के लिए बुलाया जा रहा है.यह इसलिए भी आश्चर्यजनक है क्यूंकि इंडियन नेशनल साइंस अकादमी,विज्ञान की उन तीन अकादमियों में शामिल थी,जिन्होंने सत्यपाल सिंह के उद्विकास के सिद्धांत के विरुद्ध दिए गए बयान को बेहद तर्क संगत तरीके से खारिज किया था.

वैसे यह पहली बार नहीं हो रहा है कि मोदी सरकार के किसी मंत्री ने अवैज्ञानिक या विज्ञान विरोधी बातों के महिमामंडन करनी की कोशिश की.बल्कि गणेश के सिर को प्लास्टिक सर्जरी बताने,गौ मूत्र द्वारा कैंसर का उपचार,गाय द्वारा ऑक्सीजन लेने और छोड़ने का दावा,कर्ण की पैदाईश को जेनेटिक साइंस का कारनामा बताने जैसे दर्जनों उदाहरण हैं,जिनमे प्रधानमंत्री,उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगियों द्वारा मिथकों को प्राचीन भारत की वैज्ञानिक प्रगति के उदाहरण के रूप में पेश किया गया.

वैज्ञानिक बिरादरी द्वारा समय-समय पर इस तरह के दावों को अवैज्ञानिक और अतार्किक करार देते हुए,इनका खंडन किया गया.9 अगस्त 2017 को तो देश भर में “ विज्ञान के लिए मार्च ” तक निकाला गया.विज्ञान के साथ धर्म और राजनीति का घालमेल किये जाने से नाराज भारत में जन्मे नोबल पुरूस्कार विजेता वैज्ञानिक वेंकटरमन रामकृष्णन ने 2016  में भारतीय विज्ञान कांग्रेस में कभी हिस्सा न लेने का ऐलान ही कर दिया.

पर प्रश्न यह है कि इन विज्ञान विरोधी या अवैज्ञानिक दावों को वैज्ञानिकों और विज्ञान के जानकारों द्वारा खारिज किये जाने के बावजूद प्रधानमन्त्री समेत भाजपा के मन्त्री और नेतागण निरंतर इस तरह की अवैज्ञानिक या विज्ञान विरोधी बयानबाजी क्यूँ करते रहते हैं ? आखिर इस विज्ञान विरोध सोच का आधार क्या है?

पहली बात तो यह है कि भाजपा और उसका मातृ संगठन-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिस तरह की धार्मिक राजनीति करते हैं,उसमें मिथकों को यथार्थ और अपने धर्म को विज्ञान से ऊपर सिद्ध करके ही अपने दबदबे को कायम रखा जा सकता है. दूसरा, इस अवैज्ञानिकता या विज्ञानं विरोध की बुनियाद तलाशने हों तो आपको आर.एस.एस. के विचारकों और उनके लिखे हुए तक जाना पड़ेगा. जैसे ही आर.एस.एस. के विचारकों के दशकों पुराने लिखे हुए को आप पढ़ें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भाजपा नेताओं द्वारा दिए जा रहे अवैज्ञानिक या विज्ञान विरोधी बयान,उनके सांगठनिक पूर्वजों द्वारा रखी गयी विज्ञान और तार्किकता विरोधी बुनियाद के ऊपर खड़ा किया जा रहा विशालकाय भवन है.

आर.एस.एस. के दूसरे सरसंघचालक थे-माधवराव सदाशिव राव गोलवलकर. गोलवलकर को संघ का प्रारम्भिक सिद्धांतकार माना जाता है.उनके एक चर्चित किताब है-वी आर अवर नेशनहुड डिफाइनड (हम या हमारा राष्ट्रवाद परिभाषित). यह किताब 1938 में प्रकाशित हुई.यह पुस्तक हिन्दुओं को ही राष्ट्र मानने पर जोर देती है और इस विचार की प्रवर्तक है कि अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के अधीन दोयम दर्जे के नागरिक के तौर पर रहना चाहिए.हिटलर और उसके जर्मनी की भी पुस्तक भूरि-भूरि प्रशंसा करती है.

पर इसका सत्यपाल सिंह और उनके जैसे विज्ञानं विरोधी या अवैज्ञानिक बयानवीरों से क्या सम्बन्ध है ? यह देखने के लिए हम इस पुस्तक के पृष्ठ संख्या 45-46 पर चलते हैं. इन पृष्ठों पर गोलवलकर लिखते हैं-

“ पर यह कहा जा सकता है कि तिलक, आर्यों का उद्गम आर्कटिक क्षेत्र में मानते थे. ठीक है.हम उनसे सहमत हो भी सकते हैं कि मूल रूप से आर्य यानि कि हिन्दू, उत्तरी ध्रुव के क्षेत्र में रहते थे.पर वे(तिलक) इस बात से अनिभिज्ञ थे कि प्राचीन समय में उत्तरी ध्रुव और आर्कटिक क्षेत्र वहां नहीं था,जहाँ वो आज है……

उत्तरी ध्रुव स्थिर नहीं है और बहुत समय पहले,वह दुनिया के उस हिस्से में था,जिसे हम पाते हैं कि वर्तमान में बिहार और उड़ीसा कहा जाता है ; फिर यह उत्तर पूर्व की तरफ बढ़ गया और फिर कभी पूरब की तरफ,कभी उत्तर की तरफ गतिशील हुआ,अपनी वर्तमान अवस्थिति पर आया.अगर ऐसा है तो क्या हमने आर्कटिक क्षेत्र छोड़ा और हिंदुस्तान आये या फिर हम तो हमेशा से यहीं थे और आर्कटिक क्षेत्र ने हमको छोड़ा और उत्तर की तरफ अपनी टेढ़ीमेढ़ी यात्रा पर निकल पड़ा? हमें यह कहने में हिचक नहीं है कि अगर यह तथ्य तिलक के जीवन काल में खोज लिया जाता तो वे बेहिचक इस बात को आगे बढाते कि वेदों में वर्णित आर्कटिक गृह हिंदुस्तान में था और वे हिन्दू नहीं थे,जिन्होंने उस जमीन से पलायन किया बल्कि वह आर्कटिक क्षेत्र था जिसने पलायन किया और हिन्दुओं को हिंदुस्तान में छोड़ गया…”

यह हास्यास्पद है.इन पंक्तियों को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि पृथ्वी के किसी हिस्से की बात नहीं हो रही है बल्कि किसी बस या ट्रेन की बात हो रही है कि जो हमें,हमारे गंतव्य पर छोड़ कर आगे बढ़ गयी.हमारे पैरों तले वाली धरती जब अन्यत्र खिसकने लगी तो हमने लपक कर,अपने पैर दूसरी धरती पर टिका लिए ! इस कथन से ज्यादा अवैज्ञानिक सोच क्या हो सकती है ? जब आइडियोलॉग यानि विचारक की यह हालत थी तो जो चेले इस पथ के राही होंगे, वे,एम.ए.इन एन्टायर पॉलिटिकल साइंस और सत्यपाल सिंह मार्का ही तो होंगे.

सत्यपाल सिंह एम.एस.सी. हैं,पीएच.डी. हैं,सेवानिवृत्त आई.पी.एस. हैं.उन्होंने जब ऐसा अतार्किक और अवैज्ञानिक बयान दिया तो आश्चर्य हुआ कि इतना पढ़ा-लिखा,भारतीय पुलिस सेवा का उच्च अधिकारी रहा हुआ व्यक्ति,ऐसा हास्यस्पद बयान कैसे दे सकता है? अनपढ़ तो सत्यपाल सिंह के वैचारिक गुरु गोलवलकर भी नहीं थे,एम.एस.सी.थे.लेकिन वैचारिक रास्ता, जब जड़मूर्खता की तरफ ले जाने वाला बनाना हो तो स्वयं भी तो हद दर्जे की  जड़मूर्खता के स्तर पर उतरना पड़ता है. अँधेरे के प्रवर्तकों को रौशनी का हर रास्ता बंद करना पड़ता है, रौशनी का अस्तित्व नकारना पड़ता है. इसीलिए,इस समय सरकारी नेतृत्व और संरक्षण में अवैज्ञानिकता और अतार्किकता की मुहिम चली है. जड़मूर्खता के नित नए प्रतिमान रचे जा रहे हैं.

इसलिए विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना पर होते हमलों के खिलाफ भी डट कर खड़े होने की जरूरत है ताकि हमारा समाज अतार्किकता और अवैज्ञानिकता की लहरों की भंवर में लपेट कर अँधेरे दौर में न धकेल दिया जाए.

 

 

 

 

 

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