यूनिवर्सिटी और हाज़िरनामा

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चिंटू कुमारी

हाल ही में देश के सबसे बेहतरीन शैक्षणिक संस्थानों में से एक जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी में 80 प्रतिशत हाज़िरी को अनिवार्य करने का आदेश जारी किया गया है . जेएनयू के सन्दर्भ में अगर हम बात करें तो इसके स्थापना काल से ही इस यूनिवर्सिटी को अपने अकादमिक परफॉरमेंस के लिए ‘अटेंडेंस ’ का मोहताज नहीं रहना पड़ा है. अब तक तो यहाँ के खुले वातावरण , आम तौर पर शोधार्थी और अध्यापक के बीच अनौपचारिक, मित्रतापूर्ण माहौल ने ही जेएनयू को एक बेहतरीन यूनिवर्सिटी बनाया है. ‘लड़ो पढाई करने को, पढो समाज बदलने को ’ का नारा केवल एक नारा नहीं एक विचारधारा है जिसको यहाँ के विद्यार्थियों ने जिया हैं.

यह विदित हो कि छात्रों/ छात्राओं को कक्षा में उपस्थति से दिक्कत कभी भी नहीं थी. क्योंक अक्सर ही यहाँ क्लास के बाद भी एक्सटेंडेड क्लास होती और चाय की चुस्की लेते हुए पूर्णतः छोटे-बड़े मुद्दों पर वाद-विवाद का चलन है . अतः इस आदेश के प्रतिउत्तर में छात्रों और शिक्षकों  ने हजारों की संख्या में इस विषय पर मुखर आवाज़ उठाई है .

छात्रों और शिक्षकों की इस आवाज़ को हाज़िरी और गैर हाज़िरी से ऊपर उठकर शिक्षा प्रणाली के विभिन्न वैकल्पिक दृष्टिकोणों की ओर भी अपना ध्यान ले जाने की ज़रूरत है. जब हम शिक्षा प्रणाली और शिक्षण संस्थानों की बात करते हैं तो इसके विभिन्न आयामों को समझने की ज़रूरत है. शैक्षणिक संस्थाओं का पूरा का पूरा ताना बाना  अपने समय के शासन और व्यवस्था का ही अंग होता है. और किसी देश की शासन व्यवस्था में बदलाव के साथ साथ शिक्षा प्रणाली , उसकी संरचना, ढांचा  शिक्षा नीति और पाठ्यक्रम में समय-समय बदलाव कोई नई बात नहीं है. यह शासक वर्ग ही होता है जो कि एक अच्छे विद्यार्थी, शोधार्थी, और अध्यापक और पाठ्यक्रम के पैमाने और नियमावली का निर्धारण करता  है. एक विद्यार्थी कैसा विद्यार्थी बनेगा, एक शोधार्थी कैसी रिसर्च करेगा, किस विषय पर रिसर्च करेगा, वो आंख मूंदकर आज्ञा का पालन करने वाला शिक्षार्थी बनेगा या फिर आलोचनात्मक, जिज्ञासु और प्रश्न करने वाला बनेगा यह भी राज्य व्यवस्था ही तय करता है. किसी विद्यार्थी को कितनी शैक्षणिक आज़ादी  या फिर सीमाओं या दायरे में बांधकर  रखना चाहिए ये शैक्षणिक संस्थाएं ही तय करती  हैं.

शिक्षा प्रणाली के निर्धारण को हम इसके विभिन्न आयामों से समझने की कोशिश कर सकते हैं जिसमे पहला है सामाजिक और आर्थिक आयाम, दूसरा दार्शनिक आयाम और तीसरा व्यवहारिक आयाम. जब हम शिक्षा के सामाजिक और आर्थिक आयाम की बात करते हैं तो सबसे मौलिक सवाल यह उठता है कि किस प्रकार की शिक्षा प्रणाली की कल्पना हम करते हैं ? क्या हमारे  पास कोई यूनिवर्सल यानि सार्वभौमिक अविवादित आदर्श किस्म की  शिक्षा प्रणाली  का मॉडल या पैमाना है जिसको लागू करने से हमारी शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक रूप से आमूलचूल  परिवर्तन आ पाए ? या फिर अच्छी शिक्षा व्यवस्था का एक ही पैमाना या कसौटी है और वो है हाज़िरी. यदि नहीं तो हमारे कुलपति महोदय बेहतर शिक्षा के और सारे पैमानों को दरकिनार कर केवल हाज़िरी के प्रति इतने चयनशील या चिंतनशील क्यों है ?

शैक्षणिक बेहतरी के लिए सबसे महत्वपूर्ण बाते होती हैं वहां बुनियादी सुविधाओं का होना तथा विश्वविद्यालय में समावेशी नीतियों का होना, जिससे हर सामाजिक और आर्थिक वर्ग के विद्यार्थी न केवल यूनिवर्सिटी में आ सकें बल्कि बिना ड्राप आउट के अपनी पढाई पूरी कर सकें. ऐसी सकारात्मक नीतियाँ ही समाज के हर जाति, वर्ग, धर्म, प्रदेश, भाषा तथा लिंग को सम्मानजनक प्रतिनिधित्व दे सकती है. इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए बुनियादी सुविधाओं का होना बहुत भी ज़रूरी होता है जैसे कि  हॉस्टल, पुस्त्कालाय, प्रयोगशालाएं, छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य सुविधाएँ इत्यादि. परन्तु देश के सभी विश्वविद्यालयो में बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी ,  शोध के क्षेत्र में सीट की भारी कटौती ,  स्वायत्त GSCASH (जेंडर सेल) का खात्मा , शिक्षा बजट में कटौती, शिक्षकों के पदों का भारी मात्रा में खाली रह जाने पर ध्यान देने के बजाय हाज़िरी जैसे मुद्दों पर जोर दिया जा रहा है .

यदि हम शिक्षा के दार्शनिक आयाम को समझने की कोशिश करते हैं तो भी पाते  हैं कि हमारे समक्ष कई परस्पर विरोधी धारणाएं हैं. एक तरफ जहाँ व्यवहारवादी दृष्टिकोण का मानना हैं कि विद्यार्थी के व्यवहार को कुछ विशिष्ट इनाम और सजाओं से संचालित करना चाहिए . जैसा कि जेएनयू वाईस चांसलर  का ‘ हाज़िरी फरमान ’, जिसको जो छात्र मानेगा वही छात्रवृति, हॉस्टल स्वास्थ्य सुविधाओं और अंततः डिग्री का हकदार होगा और जो नहीं मानेगा उसको सजा के रूप में इन तमाम सुविधाओं से वंचित कर दिया जायेगा. लेकिन इसी सन्दर्भ में हम शिक्षा के दूसरे दृष्टिकोण या धारणा को समझने की कोशिश करे तो पाएंगे कि व्यवहारवादी शिक्षा प्रणाली के विपरीत सृजनात्मक शिक्षा प्रणाली विद्यार्थी को न केवल  शिक्षा का केंद्र बनाती है बल्कि उसे उसकी शिक्षा में एक सक्रिय भागीदार की तरह देखती है.

जेएनयू. में आज तक का चलन यही दर्शाता है कि शिक्षा सिर्फ कक्षा  की चारदीवारी तक नहीं बल्कि उससे परे कई और संभव माध्यमो से अर्जित की जाती है . जेएनयू  में स्नाकोत्तर के समय से ही ‘ फील्ड ट्रिप ’ यहाँ के पाठ्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है .यहाँ शिक्षा का ढांचा औपचारिक न होकर अनौपचारिक होता है जिसमे न केवल विद्यार्थी बल्कि शिक्षक भी विद्यार्थी को सुनने और उनसे सीखने में नहीं हिचकता. इसी स्वतंत्र , समावेशी माहौल का असर है कि बिना हाज़िरी के चलन के भी इस संस्थान का अकादमिक स्तर देश के किसी भी अन्य संस्थान से हमेशा बेहतर है पाया गया है .

कई समाजशास्त्रियों  ने भी शिक्षा के सन्दर्भ में एक सृजनात्मक ,विद्यार्थी केन्द्रित और समावेशी शिक्षा पर जोर दिया है.  फिर चाहे वो  पॉलो फ्रेरे हो ( जिन्होंने बैंकिंग शिक्षा प्रणाली के आलोचना की है ), या इवान इलिच जिन्होंने संस्थागत शिक्षा प्रणाली के खतरे गिनवाए हैं .  प्रसिद्ध दार्शनिक जे. कृष्णामूर्ति ने तो अपनी पुस्तक “ स्कूल विथआउट फियर ” में यह भी कहा कि विद्यार्थी को जितना आजाद वातावरण मिलेगा वह उतना ही सृजनात्मक, प्रगतिशील होगा.

इस सन्दर्भ में तीसरा और संबसे महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षा का व्यावहारिक पक्ष है, जिसमे इस बात का ध्यान रखा जाना बहुत ज़रूरी है कि एक छात्र किन सामाजिक आर्थिक परेशानियों का सामना करते हुए अपने कार्य को अंजाम तक पंहुचा  पाता है, विशेष रूप से एक शोधार्थी और उसमे भी महिला शोधार्थी. यदि हम ध्यान दे तो पाएंगे की एक शोधार्थी की औसत आयु 25-30 वर्ष की होती है .यह समय विभिन्न तरह की उथल पुथल , जिम्मेदारियों, तनावों से भरा होता है. आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित और हाशिये के विद्यार्थियों को तो पढाई के साथ साथ कुछ न कुछ पार्ट टाई जॉब भी करनी ही पड़ती है . यदि वो ऐसा न करे तो देश की राजधानी में महंगाई के इस दौर में अपने और अपने परिवार का  जीवन निर्वाह नहीं कर सकता . और खासकर एक महिला के लिए पितृसत्तात्मक व्यवस्था में पीएचडी करना मील का पत्थर साबित होता है. क्योंकि 30 साल से पहले ही उनकी शादी यदि नहीं हो पाती तो समाज उसमे ही तमाम तरह की कमी कमजोरी खोजने लगता है. ऐसे में कुछ महिलाये तो सामाजिक बंधन और रीतियों को धत्ता बताते हुए अपनी पढाई अपना शोध जारी रखती हैं जबकि बहुलतः परिवार और समाज के दबाव में आकर शादी के बंधन में बंध जाती हैं. ऐसे में घर, परिवार, ससुराल और बच्चों के ज़िम्मेदारी के साथ शोध को पूरा करने के लिए उन्हें दिन दुनी रात चौगुनी मेहनत  करनी पड़ती है. और इसके अलावा कांफ्रेंस,पब्लिकेशन, टीचिंग एक्सपीरियंस ,  इत्यादि के बिना तो समझा जा सकता हैं कि नौकरी के लिए भी कहीं अप्लाई नहीं कर सकते .ऐसे में प्रशासन या व्यवस्था  चाहे तो महिला शोधार्थी के बहुआयामी व्यक्तित्व को सलाम करे उसके रास्ते को सुगम बनाये ताकि वो अपना रिसर्च पूरा कर सके या फिर यह कह दे कि वह हाजरी लगाने में असफल रही इसलिए वह रिसर्च के हकदार नहीं हो सहती. ऐसे में बेटी  पढाओ और बेटी बढाओ का नारा एक बेहतर जुमला बनकर रह जायेगा.

जेएनयू में 80 प्रतिशत हाज़िरी को अनिवार्य करने क मुद्दा केवल अनिवार्य उपस्थिति तक  सीमित नहीं है . टकराव यहाँ शिक्षा को लेकर दो अलग विचारधाराओं का है.  एक बेहतर विश्वविद्यालय की संकल्पना का है, जो शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक और मानवीय  मूल्यों का निर्माण कर सके तथा सामाजिक दायित्व का भी निर्वहन कर सके.  विवाद यहाँ शिक्षा के ‘ रेजिमेंटेशन ’ का है, जो कि बौद्धिक और अकादमिक स्वतंत्रता  के लिए बहुत ही घातक सिद्ध हो सकता है .

[author] [author_image timthumb=’on’]http://samkaleenjanmat.in/wp-content/uploads/2018/03/chintu-kumari.jpg[/author_image] [author_info] चिंटू कुमारी जेएनयू की शोध छात्रा हैं. वह जेएनयू छात्र संघ की महासचिव रह चुकी हैं. उनके इस लेख का संपादित अंश 5 मार्च को नवभारत टाइम्स के दिल्ली संस्करण में प्रकशित हुआ है. हम उनका मूल लेख पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. [/author_info] [/author]

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