जनपक्षधरता से लैस हैं कौशल किशोर की कविताएं

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लखनऊ में वरिष्ठ कवि एवं संस्कृतिकर्मी कौशल किशोर का एकल काव्य पाठ और परिचर्चा का आयोजन

संदीप कुमार सिंह

नागरिक परिषद्, लखनऊ द्वारा इंडियन काफ़ी हाउस,जहाँगीराबाद मेंशन, हजरतगंज, लखनऊ में वरिष्ठ कवि और संस्कृतिकर्मी कौशल किशोर का एकल काव्य पाठ और परिचर्चा का आयोजन किया गया.

कवि कौशल ने अपने नवीनतम संग्रह ” वह औरत नहीं महानद थी” से एक दर्जन बेहतरीन कविताओं का पाठ किया । कविताओं को पढ़ते हुए उन्होंने उनके संदर्भ भी बताए. जनपक्षधरता और जन आंदोलन से उपजी उनकी कविताएँ बिल्कुल सरल और सहज किस्म की हैं. उन कविताओं को पढ़ते हुए पाठक अपने आसपास की स्थितियों से वाकिफ़ हो लेता है. ‘  कैसे कह दूँ ‘, ; वे आए हैं ‘, ‘ तानाशाह ‘, ‘ एक दिन आएगा ‘, ‘ एक मुट्ठी रेत ‘, ‘ अनंत यात्रा ‘, ‘ जूता ‘, ‘ लख़नऊ ‘, ‘ वह औरत नहीं महानद थी ‘ शीर्षक कविताएँ उनके जन पक्षधर कवि रूप की सच्ची तस्वीर खींचती हैं ।

कौशल किशोर 1967 के आसपास से अपने लेखन की शुरुआत करते हैं जिसमें आपातकाल से लेकर आज के समय तक उनका कवि रूप उसकी ऊष्मा से मंडित है. उनका व्यक्तित्व हृदयस्पर्शी और आदर्श पारदर्शी है. वे ऐसी ही पारदर्शिता के क़ायल हैं.

काव्यपाठ के बाद परिचर्चा में  कवि भगवान स्वरूप कटियार ने कहा कि कौशल जी अपने समय के जन आंदोलनों के इनसाइक्लोपीडिया हैं . उनकी कविताएँ ग़रीब और सताए हुए लोगों में चेतना का संचार करती हैं. उनकी ये सभी कविताएँ उनके काव्य और जीवन की विकासयात्रा के विभिन्न चरणों की ओर संकेत करती हैं . कौशल जी ने अभिव्यक्ति के बँधे बँधाए ढाँचे को तोड़ा है. उनमें समाज के प्रति दायित्वबोध की चिंता है . वे सामाजिक गतिशीलता एवं आत्मीय सम्बन्धों की अपरिहार्यता पर काफ़ी जोर देते हैं .

वरिष्ठ कवि-पत्रकार सुभाष राय ने कौशल जी को सघन सहृदयता का कवि बताया. व्यक्ति, समाज, राजनीति, मानवता, संवेदना और सरोकारों के स्तर पर भी उनकी कविताएँ बेजोड़ हैं. उनमें जीवन के प्रति चौकन्नापन है । भाषा जरूर खुरदुरी है लेकिन फिर भी वह पाठक को अंदर तक संवेदित कर देती है. कविताओं का वातावरण और घटनाक्रम बिल्कुल ऐसा लगता है मानो घटनाएं अभी अभी घटी हों. कोई भी कविता हो अपनी पूर्णता के बाद वह अपने समय से मुक्त हो जाती है. कौशल के कवि में जन आंदोलन और जीवन की परस्पर सम्बद्धता निहित है. उन्होंने अपनी कविताओं में संघर्ष को मूल्य की तरह रचा है । मानवीय मूल्यों की तड़प उनकी कविताओं में दिखाई पड़ती है.

परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए संदीप कुमार सिंह ने कहा कि कौशल जी की कविताएँ जन चित्तवृत्तियों का विस्तार करती हैं. उनकी कविताओं में बहुत दर्द है, विस्मय है, घुटन, आक्रोश और तड़पन है. उनकी कविताएँ कोई किताबी दीक्षा नहीं हैं वरन् जीवन के अनुभवों, विचारोत्तेजक बहसों और जनांदोलनों की उपज हैं । वे जैसे अंदर हैं वैसे बाहर भी, जैसा उन्होंने देखा वैसा लिखा, जो कहा वही किया , बिल्कुल अटल और निडर. जुझारूपन उनके व्यक्तित्व और कविता की निशानी है. उनकी कविताएँ मानव संघर्ष की रचनात्मक अभिव्यक्ति हैं इसलिए उन्हें जन संघर्षों की अनंत यात्रा का कवि कहा जा सकता है.

गजलकार देवनाथ द्विवेदी ने पाठकों की उदासीनता पर अपनी चिंता जाहिर की । उन्होंने कहा कि हम गोर्की, मंटो, गुलेरी को तो पढ़ लेते हैं लेकिन क्या कारण है कि अपने पड़ोस में रहने वाले रचनाकार को नहीं पढ़ते हैं.  हमें किताबें खरीदकर पढ़ने की आदत डालनी चाहिए. अपने रचनाकार मित्रों को पढ़ते हुए मुझे बहुत सुखानुभूति होती है . निःसंकोच कौशल जी की कविताएँ अपने उद्देश्य में सफल हैं.

कवयित्री ऊषा राय ने कहा कि कौशल जी की कविताओं में उनका व्यक्तित्वांतरण हुआ है. इन कविताओं में उनकी यही चिंता दिखाई पड़ती है कि साहित्य कैसे जन की अनुभूति का अंग बने और वह समय का अतिक्रमण कर सके. वे अपनी कविताओं में जन सभ्यता का विमर्श करते हैं . हमें आशा है कि उनकी क़लम संघर्षों की आवाज़ बुलंद करती रहेगी.


कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ राजनीतिक कार्यकर्ता सी बी सिंह ने कहा कि ये कविताएं जन आंदोलनों कि उपज है. इन्हे आमलोगों तक ले जाने के प्रयास होने चाहिए . अच्छा हो हम संग्रह को ख़रीदे और पढ़े. शिवाजी राय ने कहा कि जनांदोलन की दृष्टी से ये शानदार कविताये है . ये श्रोताओ से संम्वाद करती है . रेवांत की संपदाज डा अनीता श्रीवास्तव ने एलान किया कि वे इस संग्रह कके विमोचन का कार्यक्रम आयोजित करेंगी ताकि इस पर व्यापक बातचीत हो सके.

परिचर्चा में विमल किशोर, आजाद शेखर उदयनाथ नाथ सिंह, भगवती सिंह, राम कृष्ण , कल्पना पांडेय, अजय शर्मा समेत कई अन्य वक्ता शामिल हुए । संचालन  वीरेंद्र त्रिपाठी ने किया। के के शुक्ल ने धन्यवाद दिया.


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