गोरख के गीतों के साथ देश-दुनिया और समाज को बेहतर बनाया जा सकता है: अरुण कमल

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क्रांतिकारी जनकवि गोरख पांडेय की स्मृति में हिरावल ने किया आयोजन
गोरख के हिंदी-भोजपुरी के जनगीतों और गजलों का गायन हुआ

पटना: 28 जनवरी. ‘ गोरख के गीतों के साथ हम देश-दुनिया और समाज को बेहतर बना सकते हैं। वे कबीर और नागार्जुन की परंपरा के एक बड़े कवि हैं। उन्होंने लोकगीतों का संस्कार लेकर भोजपुरी और ख्रड़ी बोली में गीत लिखे। उनकी कविताएं मजदूर-किसानों, उत्पीड़ित-वंचित और शोषित-अपमानित जनता के हक में लिखी गई हैं। वे आंदोलनों के पोस्टरों पर नजर आती हैं, वे नारों का रूप ले चुकी हैं। ’

वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने 28 जनवरी को प्रेमचंद रंगशाला परिसर में हिरावल द्वारा क्रांतिकारी जनकवि गोरख पांडेय की स्मृति में आयोजित ‘वतन के गीत’ नामक आयोजन का उद्घाटन करते हुुए यह कहा।
अरुण कमल ने गोरख की ‘नीरो से’, ‘वे डरते हैं’ और ‘समझदारों का का गीत’ शीर्षक रचनाओं के अंशों को सुनाते हुए कहा कि फासिज्म आता है तो लोगों की बुनियादों समस्याओं के हल के बजाए उत्सवों पर जोर देता है और राजनीति को तमाशा बना देता है। आज इस देश में एक प्रतिशत लोगों के पास देश की तिहत्तर प्रतिशत संपदा है, जाहिर है जो लोग एक प्रतिशत अमीरों के साथ हैं, उनके हित में काम कर रहे हैं, वे देशभक्त नहीं हो सकते। यह वतन, यह देश, यह मातृभूमि जिन 99 प्रतिशत लोगों का है, उन्हीं के पक्ष में ‘वतन के गीत’ गाया जा सकता है। आज सिर्फ हत्या करने के लिए पुलिस-फौज ही नहीं है, बल्कि अब सत्ता गुंडों और हत्यारों को खुद खड़ा करती है, उनसे हत्याएं करवाती है। गोरख पांडेय की हमारे लिए ऐसे वक्त में यही सीख है कि हमें चुप नहीं रहना चाहिए।
अरुण कमल ने इस अवसर पर इंकलाबी शायर फैज अहमद फैज की गजल पर आधारित एक पोस्टर आयोजकों को भेंट में दिया, जिस पर लिखा हुआ था-

यूं ही हमेशा उलझती रही है जुल्म से खल्क
न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई
यूं ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग में फूल
न उनकी हार नयी है, न अपनी जीत नई


गीतों के गायन की शुरुआत गोरख की स्मृति में लिखे गए कवि दिनेश कुमार शुक्ल के गीत ‘जाग मेरे मन मछंदर’ से हुई। उसके बाद गोरख पांडेय के गीत ‘हमारे वतन की नई जिंदगी हो’, ‘गुलमिया अब नाहिं बजइबो’, ‘सुतल रहली सपन एक देखनी’, ‘एक दिन राजा मरले आसमान में उड़त मैना’, ‘समय का पहिया चले’, ‘समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई’, ‘बीतता अंधरिया के जमनवा’, ‘जनता के आवे पलटनिया’ जैसे गोरख पांडेय के हिंदी-भोजपुरी के मशहूर जनगीतों को संतोष झा, सुमन कुमार, राजन कुमार, प्रीति प्रभा, देवसेना जी, सलोनी, पलक, पीहू, भारती, नेहा, निक्की, रेशमा, अरविंद, दिलीप और रोहित ने सुनाया। देवसेना जी ने उनकी दो गजलों ‘हम कैसे गुनहगार हैं, उनसे न पूछिए’ और ‘रफ्ता- रफ्ता नजरबंदी का जादू घटता जाए हैं’ को अपनी सधी हुई आवाज में गाया। वायलिन, ढोलक और तबला पर क्रमशः संगीत, राजेश और शंकू ने साथ दिया।
आखिर में अरविंद, दिलीप और रोहित ने गोरख पांडेय की लंबी कविता ‘उठो मेरे देश’ के अंश की नाट्य प्रस्तुति की।
संचालन जसम के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने किया। आयोजन में जिन रचनाओं को गाया गया, उन पर संक्षिप्त टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि गोरख ने क्रांतिकारी परिवर्तन में मनुष्य के सामूहिक श्रम की भूूमिका को बड़े ही सहज अंदाज में समझाया। उनकी रचनाएं जनता की राजनीतिक चेतना को उन्नत करती हैं और उसे अपनी ही क्रांतिकारी ताकत के प्रति भरोसा जगाती हैं। अत्याचार, अन्याय, हिंसा, गुलामी और गैरबराबरी पर आधारित सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक-सांस्कृतिक व्यवस्था को बुनियाद के साथ बदल देने के लिए गोरख की रचनाएं हमेशा प्रेरणा देती रहेंगी। साम्राज्यवादी, सांप्रदायिक और सामंतवादी अत्याचार और नृशंसता के खिलाफ संघर्षों में अब भी वे जीवित हैं।

इस अवसर पर प्रो. संतोष कुमार, प्रो. भारती एस कुमार, ऐपवा नेता सरोज चैबे, संतोष सहर, राजेश कमल, कुंदन, राम, अभिनव, नवीन, अभ्युदय, प्रकाश, रंगकर्मी विजेंद्र टांक, सनत कुमार, धर्मेश मेहता, मृत्युंजय कुमार, गौतम, उत्तम, पप्पू ठाकुर, ब्रजेश शर्मा, इंद्रदीप चंद्रवंशी, अशोक तिवारी, राजू मिश्रा, अभिषेक, जहांगीर आदि मौजूूूद थे।

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