गुजरात में पाठ्यपुस्तकों का भगवाकरण

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 लोकेश मालती प्रकाश

 

 “अपने विषय-वस्तु व रूप से [पाठ्यपुस्तकें] वास्तविकता की विशिष्ट रचनाओं, संभावित ज्ञान के व्यापक ब्रह्मांड में से चुनने और व्यवस्थित करने के विशिष्ट तौर-तरीकों को प्रकट करती हैं। रेमण्ड विलियम्स जिसे चयनशील परंपरा कहते हैं, वे उसी का मूर्त रूप हैं – यानी किसी खास व्यक्ति का चयन, वैध ज्ञान और संस्कृति की किसी खास व्यक्ति की दृष्टि – एक ऐसी परंपरा जो किसी एक समूह की सांस्कृतिक पूंजी को मान्यता देने की प्रक्रिया में दूसरों की सांस्कृतिक पूंजी को अमान्य बना देती है।

माइकेल एप्पल (कल्चरल पॉलिटिक्स एंड दी टेक्स्ट )

 

कुछ समय पहले खबर आयी थी कि गुजरात में नौवीं क्लास की हिन्दी की पाठ्यपुस्तक में ईसा मसीह को ‘ राक्षस ’ कहकर संबोधित किया गया है। इस पर काफी विवाद मचा। गुजरात सरकार ने सफाई दी कि यह गलती से छप गया है और विवादित किताब के ऑनलाइन संस्करण से इस गलती को हटा भी दिया गया। अगर सरकार की दलील को थोड़ी देर के लिए मान भी लें तो भी यह कहना लाज़िम होगा कि ये एक तरह का ‘ फ्रायडियन स्लिप ’ था यानी गलती से वह भावना ज़ाहिर हो गई जो सचमुच मन में थी।

अल्पसंख्यकों से संघ परिवार और भाजपा का प्रेम जगजाहिर है। कुछ साल पहले ही एक इंटरव्यू में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुस्लिमों के संदर्भ में कहा था कि दुखः तो पिल्लों के गाड़ी के नीचे आ जाने पर भी होता है ! इससे यह भी समझना चाहिए कि दुखः जैसी सहज मानवीय संवेदना भी हमारी वैचारिकता के छन्नी से छनकर ही उपजती है। यही कारण है कि कर्नाटक की पत्रकार व कार्यकर्ता गौरी लंकेश की हत्या पर एक खास वैचारिकता के लोग खुलेआम खुशी मना रहे हैं।

अगर सहज-सामान्य भावनाएं राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित हो सकती हैं तो फिर पाठ्यपुस्तकें तो राजनीति का अखाड़ा होंगी ही क्योंकि स्कूल में बच्चे क्या पढ़ेंगे यह सवाल कई दूसरे बेहद गंभीर सवालों से जुड़ा हुआ है। मिसाल के लिए, यह सवाल कि देश के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व्यवस्था का स्वरूप कैसा होगा ? नागरिकता और नागरिक अधिकारों के क्या मायने होंगे ? समाज की विभिन्न गैरबराबरियों के खिलाफ़ जनमानस तैयार किया जाएगा या उन गैरबराबरियों को विविधता का नाम देकर वैध बनाया जाएगा ? इसी तरह के कई और सवालों की पूरी फ़ेहरिस्त ही बनाई जा सकती है जिनके चलते पाठ्यपुस्तकों की भूमिका बेहद संवेदनशील और राजनीतिक हो जाती है।

प्रख्यात शिक्षाशस्त्री प्रो. एप्पल का ऊपर दिया हुआ वक्तव्य भी इसी तरह इशारा कर रहा है। इससे हम यह अंदाजा लगा सकते हैं कि संघ परिवार के पाठ्यपुस्तकों के सांप्रदायीकरण के एजेंडे का मकसद क्या है। लेकिन इसकी चर्चा करने से पहले हम यह देखने की कोशिश करेंगे कि पाठ्यपुस्तकों के सांप्रदायीकरण के असल मायने क्या हैं और इसे किस तरह गुजरात सरकार के स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों में लागू किया गया है।

पाठ्यपुस्तकों के सांप्रदायीकरण के मायने

अगर सरल शब्दों में कहें तो पाठ्यपुस्तकों के सांप्रदायीकरण का मतलब है पाठ्यपुस्तकों की सामग्री, प्रस्तुति व भाषा में किसी धर्म विशेष के नज़रिए को प्राथमिकता देना। यह काम बिल्कुल स्पष्ट और खुल्लमखुल्ला किया जा सकता है और बड़ी बारीकी से भी। लेकिन यहां हम जिस सांप्रदायीकरण को समझने की कोशिश कर रहे हैं, यानी हिंदुत्ववादी सांप्रदायीकरण को उसका चरित्र इतना सरल नहीं है। असल में समाज या इतिहास के हिंदूवादी नज़रिए जैसी कोई चीज़ होती ही नहीं है। इसका कारण खुद कथित हिंदू धर्म की जाति-आधारित आंतरिक संरचना है। इस संरचना में उच्च वर्णों का प्रभुत्व ऐतिहासिक तौर पर स्थापित किया गया है। पाठ्यपुस्तकों के लेखन में भी यही उच्च वर्णीय या ब्राह्मणवादी प्रभुत्व काम करता है। कहने का मतलब यह है कि जिसे हिंदुत्ववादी सांप्रदायीकरण कहा जाता है असल में वह उच्च वर्णों का ब्राह्मणवादी नज़रिया है।

समाज के दलित व पिछड़े समुदायों और स्त्रियों की आवाज़ों को, उनके इतिहास व नज़रिए को दबाकर इस ब्राह्मणवादी नज़रिए का प्रभुत्व पाठ्यपुस्तक लेखन में पिछली लगभग दो शताब्दियों में स्थापित किया गया है। जब इतिहास की किताबों में वैदिक युग का महिमामंडन किया जाता है या फिर गुप्त काल को ‘स्वर्णयुग ’ कहा जाता है तो यह बात छिपा ली जाती है कि ब्राह्मणवादी वर्चस्व के खिलाफ़ तमाम वेद-विरोधी परंपराएं व जीवन पद्धतियां भी देश में सक्रिय थी या यह कि स्वर्णयुग असल में तीखे जाति-विभाजन का दौर भी था।

हिंदुत्ववादी सांप्रदायीकरण के संदर्भ में यह स्पष्टता इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इसके ब्राह्मणवादी चरित्र को ध्यान में न लाने से पाठ्यपुस्तक लेखन में इस सांप्रदायीकरण के लंबे इतिहास को देख पाना संभव नहीं हो पाएगा। और साथ ही इस प्रक्रिया के असल किरदारों को भी पहचानना मुश्किल होगा।

समाज विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों से

ब्राह्मणवादी सांप्रदायिकता का एक मुख्य पहलू है देश के इतिहास और संस्कृति की एकतरफा छवि का निर्माण। इसका एक उदाहरण मिलता है छठी क्लास की समाज विज्ञान की किताब में जिसमें ‘वैदिक काल’ के अध्याय की पहली लाइन है, “वेदों को भारतीय संस्कृति की प्राचीनतम किताबें माना जाता है ”! इस एक लाइन में देश की तमाम सांस्कृतिक विविधताओं व अंतरविरोधों और उनके जटिल इतिहास को ध्वस्त कर दिया गया है। इसी पाठ में आगे यह बताया गया है कि वैदिक काल में समाज चार समूहों में विभाजित था, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र या ‘दास’।

आगे लिखा है कि जिन लोगों ने वेदों की रचना की उन्होंने खुद को ‘आर्य’ कहा और जिनसे उनका संघर्ष था उनको ‘दस्यु’ या ‘दास’ कहा। यानी कि वेद शूद्रों के ग्रंथ नहीं हैं बल्कि विजेता आर्यों के ग्रंथ हैं। ऐसे में एक खास समूह के ग्रंथ को पूरी भारतीय संस्कृति का प्राचीन ग्रंथ बताने का क्या मतलब निकलता है ? देश में ऐसे अनेक समूह और समुदाय हैं जिनकी संस्कृति का आधार वेद या वैदिक परंपराएं नहीं हैं। इसमें तमाम दलित व पिछड़े वर्गों समेत अल्पसंख्यक समुदाय, आदिवासी समुदाय, आदि शामिल हैं। ऐसे में ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक प्रतिरूपों को ही देश की संस्कृति बना कर पेश करने का मतलब है समाज के उच्च वर्णों का प्रभुत्व व उसकी वैधता को बनाए रखने की कोशिश करना।

इससे ही जुड़ा यह सवाल है कि इतिहास की किसी किताब में वेदों या दूसरे धार्मिक किताबों के प्रति किस तरह का नज़रिया रखना चाहिए ? वेदों का अपना ऐतिहासिक महत्व है इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन इस पाठ्यपुस्तक में इसके महत्व को एक अलग आयाम दिया गया है जो सीधे-सीधे इतिहास की ब्राह्मणवादी सांप्रदायिक व्याख्या से जुड़ा हुआ है। अन्यथा कोई दूसरी वजह नहीं है यह दावा करने का कि वेद कथित ‘भारतीय संस्कृति’ के प्राचीनतम ग्रंथ है।

ऐसा ही एक और उदाहरण है आठवीं क्लास की समाज विज्ञान की किताब जिसमें  ‘ हमारी भारत माता ’ का एक चित्र दिया गया है। यह चित्र राजा रवि वर्मा की बनाई किसी हिन्दू देवी के चित्र जैसा आभास देता है। साड़ी, गहनों में लिपटी हुई जिस तरह की नियंत्रित मुद्रा में भारत माता इस चित्र में दिखाई गई हैं उसके आधार में एक आदर्श स्त्री का ब्राह्मणवादी नज़रिया मौजूद है। मजे की बात यह है कि स्त्री के इस चित्रण में आधुनिक बाज़ार द्वारा फैलाई स्त्री की आदर्श छवि की छाप भी है – इसमें भारत माता गोरी और दुबली पतली दिखाई गई हैं। औरतों को गोरा और दुबला बनाने का बाज़ार भारत माता की ऐसी छवि का जरूर स्वागत करेगा। ध्यान देने की बात यह भी है कि सांप्रदायिकता का चेहरा सिर्फ वर्णवादी ही नहीं मर्दवादी भी है।

इससे जुड़ी एक बात और है। इतिहास पढ़ाते समय देश को ‘भारत माता’ या ‘मातृभूमि’ या किसी ऐसी दैवीय छवि के रूप में पेश करना भी सांप्रदायिक एजेंडे का ही हिस्सा है। देश न तो दैवीय इकाई है और न ही किसी स्त्री या पुरुष की तरह प्राकृतिक पैदाइश। देश या राष्ट्र-राज्य का निर्माण एक ऐतिहासिक प्रक्रिया से होता है और यह बात भारत पर भी लागू होती है। लेकिन समाज विज्ञान की किताबों में ‘भारत माता’ का चित्र और जिस तरह का इतिहास है उससे लगता है भारत नाम का यह देश कई सदियों से यूं ही विद्यमान था जैसा कि आज है।

साथ ही इस तरह के चित्रण से यह बात भी छिप जाती है कि भारत समेत सभी आधुनिक राष्ट्र-राज्यों के निर्माण में तमाम तरह की वर्चस्ववादी प्रक्रियाओं और प्रतिरोध के संघर्षों का योगदान रहा है जिनकी उपस्थिति आज भी है। यानी देश कोई ऐसी इकाई नहीं है जो सदियों से थी और आगे भी वैसी ही रहेगी। इस तथ्य को दरकिनार करने से एक किस्म का अंधराष्ट्रवाद तैयार होता है जिससे वर्चस्व की राजनीति करने वाले तबकों पर सवाल खड़ा करने की गुंजाइश नहीं बचती।

ब्राह्मणवादी व मर्दवादी राजनीतिक वर्चस्व की एक और मिसाल मिलती है सातवीं क्लास की समाज विज्ञान की किताब में जिसमें राजपूत राजाओं पर एक अध्याय है। इसमें एक पूरे पैराग्राफ़ में कुछ यों लिखा गया हैः “राजपूत बहुत ही बहादुर थे। अपने देश के लिए अपनी जान देने वे गर्व महसूस करते थे। मर जाना मगर डरना कभी नहीं, शरणार्थियों की रक्षा करना, सच बोलना और सच के लिए लड़ना उनके खास गुण थे। राजपूतानियां (राजपूत महिलाएं) अपने सतीत्व और निडरता के लिए जानी जाती थीं। वे अपने पतियों, बेटों और भाइयों को मुस्कराते हुए युद्धभूमि विदा करती थी…अगर उनके पति हार जाते या युद्ध में शहीद हो जाते तो वे जौहर करती थी। राजपूत युग की वीर गाथाएं भारत के इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों से अंकित हैं।“ इसी तरह का एक और वाक्य इस किताब में आगे भी है जिसमें कहा गया है कि दिल्ली में शहाबुद्दीन के हमले में पृथ्वीराज चौहान के हारने के साथ ही राजपूतों के शासन का अंत हो गया और “वीरता और त्याग की बजाय लोग सत्ता के लिए एक-दूसरे के खिलाफ़ षड़यंत्र करने लगें। दिल्ली की गद्दी खून से रंग गई।“

यहां बड़ी चालाकी से सामंतों व राजाओं की आपसी लड़ाइयों को देशप्रेम से जोड़ दिया गया है। यह देशप्रेम का भी एक खास किस्म का पाठ है – उसे सिर्फ राज्य की सीमाओं की रक्षा से जोड़कर पेश करना। इस सवाल की यहां कोई गुंजाइश नहीं है कि राजपूत राजाओं व सामंतों की वीरता से आम लोगों का जीवन कैसे बेहतर होता था? इसी तरह राजपूत औरतों की भी एक मर्दवादी तस्वीर बनाई गई है जहां उनका सतीत्व और जौहर जैसे हत्याकांड गौरवान्वित किए गए हैं। सतीत्व और उसकी रक्षा के लिए किए गए जौहर महिलाओं पर नियंत्रण की जिस ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था का हिस्सा थे उसकी पोल खोलने और आलोचना करने की बजाय उसे आदर्श की तरह पेश किया गया है। यह इस बात का उदाहरण है कि सांप्रदायिकता इतिहास को विकृत करके असल में वर्तमान और भविष्य को विकृत करती है।

राजपूतों की बहादुरी की बात हो और महाराणा प्रताप का जिक्र न हो यह कैसे हो सकता है। हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा और उनके घोड़े चेतक की बहादुरी पर एक पूरा पैराग्राफ़ है जिसे इतिहास की किताब की बजाय शायद साहित्य की किताब में होना चाहिए था। वैसे इतनी गनीमत जरूर बरती है कि राजस्थान की तरह यहां हल्दीघाटी युद्ध में महाराण को जितवाया नहीं गया है।

इस किताब में एक और चालाकी है। यहां मध्यकाल के सल्तनत और मुग़ल राज्यों को मुस्लिम शासन नहीं कहा गया है लेकिन उनके बरक्स राजपूत युग और विजयनगर के ‘हिन्दू राज्य’ की बात की गई है। इस तरह सल्तनत व मुग़ल राज्यों को बिना कहे ही मुस्लिम कह दिया गया है। इस तरह की चालाकियां और भी हैं। मिसाल के लिए, छठी क्लास की समाज विज्ञान की किताब में ही गुप्त साम्राज्य का विवरण है जिसमें यह बताया गया है कि समुद्रगुप्त हिन्दू धर्म मानता था और उसके रीति-रिवाजों व परंपराओं का पालन करता था। इसके अलावा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य को भी हिन्दू धर्म के वैष्णव पंथ का अनुयायी बताया गया है। साथ ही गुप्त काल को ‘भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग’ भी बताया गया है। इसमें यह कहा गया है कि स्वर्ण युग उस दौर को कहते हैं जब “असाधारण राजनीतिक उपलब्धियां हों और सामाजिक जीवन में शांति व लोगों में आपसी सहयोग हो”। इस स्वर्ण युग की सामाजिक व धार्मिक उपलब्धियों में यह गिनाया गया है कि गुप्त काल में लोग प्रगतिशील थे और सुख व संतोष के साथ जीवन जी रहे थे। साथ ही यह भी कि “गुप्त काल में धर्म का महत्व बढ़ गया था…हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान हुआ मगर गुप्त शासक दूसरे धर्मों के प्रति सहिष्णु थे। गुप्त राजा अश्वमेध यज्ञ जैसे यज्ञ किया करते थे…”। इस तरह ‘स्वर्ण युग’ को हिन्दू युग से जोड़ दिया गया है। लोगों के आपसी सहयोग की बात करके तीखे जाति विभाजनों के तथ्य पर पर्दा डाल दिया गया है। ध्यान देने की बात है कि इसी किताब के पहले भाग में यह कहा गया है कि “बीते समय की प्रतिष्ठा, समृद्धि और गौरव को हासिल करने के लिए राष्ट्रवाद और देशभक्ति की भावना जरूरी है”।

दीनानाथ बत्रा की किताबें

ऐसा लगता है कि गुजरात की भाजपा-संघ सरकार का एजेंडा इन तमाम उदाहरणों से पूरा नहीं हो पा रहा था जिनकी एक झलक ऊपर दी गई है। इसीलिए 2014 में गुजरात सरकार ने एक आदेश जारी करके दीनानाथ बत्रा की लिखित नौ किताबों को अतिरिक्त पाठ्य सामग्री के तौर पर पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया। इन किताबों में इतिहास के नाम पर कपोल-कल्पनाओं और बेसिर-पैर के कुतर्क रखे गए हैं जिनकी किसी शिक्षित समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। अफ़सोस की बात है कि ऐसी किताबें पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाई जा रही हैं। वैसे तो दीनानाथ बत्रा की प्रतिभा का जिक्र पत्र-पत्रिकाओं में भरपूर हुआ है लेकिन यहां उसकी एक बानगी देना प्रासंगिक होगा। इन किताबों में से एक ‘तेजोमय भारत’ में शामिल कुछ अंश इस प्रकार हैं –

– शून्य का प्रयोग आज से 20,000 साल पहले दुश्यंत व शकुंतला के युग में ॠषि गुत्स्मद ने किया था।

– रामायण काल में वानर राज्य के दो इंजीनियर बंदरों ने राम सेतु का निर्माण किया था।

– परमाणु उर्जा की खोज ॠषि कणाद ने की थी और इससे जुड़ी सभी संस्कृत किताबें जर्मनी चली गई थी लेकिन दूसरे महायुद्ध में जर्मनी के हारने के बाद अमरीका और रूस ने इन किताबों से ही परमाणु ऊर्जा का ज्ञान हासिल कर लिया।

– अमरीका के विकसित होने का कारण है वहां काम कर रहे प्रतिभाशाली भारतीय।

बत्रा की दूसरी किताबों में भी ऐसे उदाहरणों की भरमार है। मिसाल के लिए एक किताब में बच्चों से कहा गया है कि भारत का नक्शा बनाते समय उसमें पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, नेपाल, भूटान, तिब्बत, बांग्लादेश, श्रीलंका और बर्मा को भी शामिल करना चाहिए क्योंकि ये ‘अखंड भारत’ के हिस्से हैं। एक और किताब में सलाह है कि जन्मदिन पर मोमबत्तियां फूंक कर बुझाना पश्चिमी संस्कृति है जिससे बचना चाहिए और उसकी जगह जन्मदिन पर स्वदेशी कपड़े पहन कर हवन, पूजा-पाठ और गायों को खाना खिलाना चाहिए।

ब्राह्मणवादी सांप्रदायिकता का पुराना एजेंडा

यह समझना भारी भूल होगी कि पाठ्यपुस्तकों का सांप्रदायीकरण कोई नई परिघटना है। पाठ्यपुस्तकों के कुछ अध्ययन यह स्पष्ट करते हैं कि सांप्रदायिक दृष्टि किताबों में पहले भी मौजूद रही है। मिसाल के लिए, ऐसे ही एक अध्ययन टेक्स्टबुक रेजीम्सः ए फ़ेमिनिस्ट क्रिटीक ऑफ़ नेशन एंड आइडेंटिटी (2010) के अनुसार सन् 1992 में लागू की गई नौंवी क्लास की समाज विज्ञान की किताब में यह कहा गया है कि भारत में आर्यों के आगमन से लेकर हिन्दू प्रभुत्व के खत्म होने के दौर तक भारतीय सभ्यता ने अनेक क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान दिया है और उच्च नैतिक मूल्य इसमें शामिल हैं। यही कारण है कि यह सभ्यता अबतक बनी हुई है जबकि मिश्र, मेसोपोटामिया और चीन की प्राचीन सभ्यताएं खत्म हो गई हैं। इसी किताब में यह भी बताया गया है कि वैदिक हिन्दू धर्म भारतीय सभ्यता का आधार है। इस किताब में वर्ण व्यवस्था के बारे में बताया गया है कि यह मानव सभ्यता को आर्यों की देन थी। उसी साल लागू की गई पांचवी क्लास की समाज विज्ञान की किताब में हिन्दू मिथकों और रामायण-महाभारत की कहानियों व मिथकीय चरित्रों को प्रमाणिक इतिहास के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

इसी तरह 1996 में लागू की गई समाज विज्ञान की किताब में लिखे पाठ्यक्रम के उद्देश्यों में से कुछ उद्देश्य इस प्रकार के भी हैं,

– बच्चों को यह समझना कि राजपूत काल में आक्रांताओं की जीत का कारण था शासकों का अभिमान, आपसी कमजोरियां, टकराव और एकता का अभाव।

– बच्चों को यह समझना कि विदेशियों के आक्रमण के बावजूद दक्षिण भारत में भारतीय सभ्यता और संस्कृति की मशाल जलती रही। और साथ भी मध्यकाल में भारतीय महिलाओं के चरित्र और आत्म-सम्मान की समझ बनाना।

इन उदाहरणों से यह बात भी उभरती है कि वर्तमान पाठ्यपुस्तकों की सामग्री में जो ब्राह्मणवादी सांप्रदायिक झुकाव हैं वे पहले भी ठीक उसी तरह मौजूद थे। इस तथ्य को समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अक्सर सांप्रदायीकरण के एजेंडे को सिर्फ भाजपा-संघ परिवार के संदर्भ में ही रख कर देखा जाता है। इस गड़बड़ी का करण हिन्दू सांप्रदायिकता की वह अधूरी समझ है जिसका जिक्र पहले किया गया था। हिन्दू सांप्रदायिकता का आधार ब्राह्मणवाद और इसपर आधारित पितृसत्ता है जो इसे सामाजिक, वैचारिक और ऐतिहासिक आधार प्रदान करती है।

यह चर्चा काफी हद तक ब्राह्मणवादी सांप्रदायीकरण के मकसद को भी साफ करती है। इसे अगर संक्षेप में कहें तो किसी भी शोषणकारी व्यवस्था के टिके रहने के लिए सबसे उपयुक्त स्थिति यह होती है कि शोषण के शिकार जन इसे प्राकृतिक अवस्था माने और सवाल न खड़े करें। स्कूल व्यवस्था और पाठ्यपुस्तकों के जरिए देश का ब्राह्मणवादी, पितृसत्तात्मक व पूंजीवादी शासक वर्ग हमारी भावी पीढ़ियों के दिमाग में ऐसा ही ज़हर घोलना चाहता है जिससे उनमें सवाल उठाने की कोई क्षमता ही न बचे और सदियों से जारी शोषण और लूट की व्यवस्थाएं बरकरार रहें।

 

 [author] [author_image timthumb=’on’][/author_image] [author_info]कार्यकर्ता, लेखक व अनुवादक लोकेश मालती प्रकाश भोपाल में रहते हैं[/author_info] [/author]

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