गंगा प्रसाद ने सारा जीवन श्रमिक आंदोलन और वामपपंथी-जनवादी विचारों के प्रचार-प्रसार को समर्पित किया

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गंगा प्रसाद स्मृति दिवस का आयोजन
लखनऊ, 4 अप्रैल। श्रमिक नेता और लेनिन पुस्तक केन्द्र के प्रबंधक गंगा प्रसाद की पहली बरसी पर आज नरही, हजरतगंज स्थित लोहिया मजदूर भवन में उनकी स्मृति में जन संस्कृति मंच और लेनिन पुस्तक केन्द्र की ओर से कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इसके मुख्य वक्ता थे वामपंथी विचारक जयप्रकाश नारायण। अध्यक्षता की अवधेश कुमार सिंह ने तथा इस अवसर पर एपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन, वरिष्ठ सोशलिस्ट नेता गिरीश पाण्डेय, जसम उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष कौशल किशोर, कवि भगवान स्वरूप कटियार, इप्टा के प्रदीप घोष, भाकपा माले के लखनऊ जिला प्रभारी रमेश सिंह सेंगर आदि ने अपने विचार रखे। जसम लखनऊ के संयोजक कवि श्याम अंकुरम ने कार्यक्रम का संचालन किया।
इस स्मृति कार्यक्रम में कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी नागभूषण पटनायक की किताब ‘क्रान्ति की राह में…’ का लोकार्पण भी किया गया। यह किताब विख्यात पार्वतीपुरम कांसिपिरेसी केस के समय अदालत को दिया गया उनका 500 पृष्ठों का जवाब है।
अंग्रेजी में यह दस्तावेज ‘ कांसिपिरेसी…नो/रिवोल्यूशन...एस ’ का हिन्दी अनुवाद है। अवधेश कुमार सिंह द्वारा अनूदित यह किताब हाल में वाणी प्रकाशन, दिल्ली प्रकाशन द्वारा छप कर आई है। इस मौके पर कवयित्री व कथाकार उषा राय ने नागभूषण पटनायक की एक कविता का पाठ भी किया। यह कविता किस्टा गौड़ और भूमैया को फांसी दिये जाने के बाद नागभूषण पटनायक ने लिखी थी।
कार्यक्रम में मुख्य व्याख्यान नागभूषण पटनायक के संघर्षों के साथी रहे जयप्रकाश नारायण का था। इस किताब पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में तीन ऐसे बिन्दू हैं जिन पर तीखी बहसें रही हैं। ये है आजादी का मूल्यांकन, भारतीय समाज व राज्य का चरित्र तथा क्रान्ति की राह। इन प्रश्नो पर नागभूषण जी ने ऐतिहासिक तथ्यों के साथ विश्लेषण किया है।
अपने सम्पूर्ण दस्तावेज में नागभूषण जी सर्वहारा दृष्टिबिन्दू पर मजबूती से खड़े हैं। इसी नजरिये उन्होंने भारत के कम्युनिस्ट ओदोलन, इतिहास, राष्ट्रवाद, धर्म, जाति, संस्कृति, भाषा आदि पर वस्तुपरक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। बड़ी बारीकी के साथ उन्होंने सवार्ल्टन इतिहास लेखन का खण्डन करके तार्किक विश्लेषण किया है। उषा राय ने यह जानना चाहा कि महिला प्रश्न पर नागभूषण जी का क्या दृष्टिकोण रहा है। जयप्रकाश जी ने बताया कि इस किताब में नागभूषण पटनायक ने साांमंती व्यवस्था से लेकर पश्चिम के महिला आंदोलन का विश्लेषण करते हुए महिला मुक्ति पर एक पूरा अध्याय ही लिखा है। उनकी समझ है कि आधी आबादी को गोलबंद किए बगैर क्रान्ति असंभव है।
वरिष्ठ सोशलिस्ट नेता गिरीश पाण्डेय ने अदालत द्वारा नागभूषण पटनायक को फांसी की सजा सुनाये जाने और नागभूषण द्वारा दया याचना करने से इन्कार किए जाने के बाद उनकी रिहाई के लिए चले आंदोलन और आई पी एफ के निर्माण में उनकी राष्ट्रव्यापी भूमिका को याद किया। इप्टा के प्रदीप घोष ने नागभूषण पटनायक के जीवन पर अनिल बर्वे के नाटक ‘थैंक यू मिस्टर ग्लाड’ में अपने अभिनय की चर्चा की जिसमें उन्होंने ग्लाड की भूमिका की थी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए इस किताब के अनुवादक अवधेश कुमार सिंह ने कहा कि नागभूषण पटनायक पर सत्ता द्वारा उन पर कांसिपिरेसी का अभियोग था। इस किताब के माध्यम से नागभूषण पटनायक का पुरजोर तरीके से कहना था कि कम्युनिस्ट कभी साजिश नहीं करते बल्कि साजिश सत्ता संस्कृति है जिसके खिलाफ वे जनसंघर्ष और जनयुद्ध के माध्यम से अन्यायपूर्ण सत्ता  को बेदखल करते हैं और अपनी सत्ता स्थापित करते है। अपनी इस बात को पुष्ट करने के लिए उन्होंने कम्युनिस्ट मेनिफेस्टों और कई दस्तावेजों का इस किताब में उल्लेख किया है।
कार्यक्रम के आरम्भ में कामरेड गंगा प्रसाद के चित्र पर माल्यार्पण किया गया। इस अवसर पर वक्ताओं ने गंगा प्रसाद के जीवन व कर्म पर अपने विचार रखे तथा उनके साथ की स्मृतियों को साझा किया। उनका कहना था कि गंगा प्रसाद कम्युनिस्ट आदर्शों में तपे ऐसे योद्धा थे जिन्होंने अपना सारा जीवन श्रमिक आंदोलन और लेनिन पुस्तक केन्द्र के माध्यम से वामपपंथी-जनवादी विचारों व संस्कृति के प्रचार-प्रसार को समर्पित कर दिया। गंगा प्रसाद ने बड़े ही सृजनात्मक तरीके से पुस्तक केन्द्र का संचालन किया। इसमें उनका विजन दिखता है जिसके तहत उन्होंने इसे लोगों को जोड़ने वाले संगठक और पुस्तक बिक्री केन्द्र के साथ इसे अध्ययन और जन चेतना के प्रचार का माध्यम बना डाला।
उनकी जीवन कथा विद्रोही से क्रान्तिकारी तथा श्रमिक से सर्वहारा बुद्धिजीवी में रूपान्तरण की कथा है। लकवा के आघात के बाद उनके पास जो जीवन बचा था तथा शरीर के अन्दर जो भी क्षमता शेष थी, उसका उपयोग वे वामपंथी राजनीति और संस्कृति के लिए करना चाहते थे, उस स्वप्न के लिए करना चाहते थे जिसे युवा दिनों से वे देखते चले आ रहे थे और उन्होंने ऐसा किया भी। उन्होंने जिस रास्ते का वरण किया वह कठिनाइयों से भरा था। वहां पाना नहीं खोना था। आज के समय में गंगा प्रसाद जैसे लोग दुर्लभ होते जा रहे हैं। उनका जीवन और कर्म हमलोगों के लिए अनुकरणीय है, उससे बहुत कुछ सीखना चाहिए।
इस अवसर पर कौशल किशोर की नई किताब ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ और ‘क्रान्तिकारी ट्रेड यूनियन के महानायक योगेश्वर गोप’ ;संपादन व संकलन – अवधेश कुमार सिंह भी जारी की गई। कार्यक्रम में बी एन गौड़, एस के पंजम, आर आर गौतम, देवनाथ द्विवेदी, विमल किशोर, अशोक श्रीवास्तव,  अली सागर, आर के सिन्हा, के के शुक्ला, वीरेन्द्र त्रिपाठी , नारायण स्वरूप चौरसिया, आर बी सिंह, आशीष कुमार सिंह, मंजू गौतम, सुरेन्द्र गौतम, राजीव गुप्ता तथा गंगा प्रसाद के परिवार सहित काफी संख्या में लोग उपस्थित थे।

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