केदार बाबू की कविताएँ बुंदेलखंड की सांस्कृतिक गजेटियर हैं

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रमाशंकर सिंह

आज केदारनाथ अग्रवाल का जन्मदिन है. आज ही के दिन 1911 में उनका जन्म हुआ था.

युग की गंगा, लोक और आलोक, फूल नहीं रंग बोलते हैं, आग का आईना, गुलमेंहदी,पंख और पतवार, हे मेरी तुम, अपूर्वा, बोले बोल अबोल, जो शिलाएं तोड़ते हैं, आत्म गंध, अनहारी हरियाली जैसे सुंदर कविता संग्रह उनके नाम है.

तेजी से उजाड़ होते जा रहे बुंदेलखंड, मेहनतकश बुंदेलखंड को प्रवासी मजदूरों के हिन्टरलैंड में बदल जाने की कहानी को अगर शुरू से जानना हो तो केदारनाथ अग्रवाल को जरुर पढ़ा जाना चाहिए.

यह बुंदेलखंड का मेरा तीसरा फेरा था. इसके पहले 2016 के जून में बांदा जिला आया था. तब बुंदेलखंड में सूखा पड़ा हुआ था. यह सूखा फरवरी महीने से ही शुरू हो गया था.

इसके बाद अगस्त 2017 में आया, तब बारिश का मौसम था और ललितपुर से महोबा तक उड़द और तिल की फसल से धरती ढकी हुई थी.

इधर अक्टूबर 2017 के दूसरे पखवाड़े में बुंदेलखंड के तीन जिलों ललितपुर, हमीरपुर और महोबा में फिर से आना हुआ.

जब भी मैं बुंदेलखंड से लौटता हूँ तो सोचता हूँ कि एक रिपोर्ट लिखूं लेकिन इसके बाद कुछ का कुछ हो जाता है. मैं सब कुछ भूल जाता हूँ और केवल रंग बचते हैं. रंग भी क्या, केवल उनकी छटाएं बचती हैं.

फूल नहीं रंग बोलते हैं

बांदा में पैदा हुए हिंदी के आदरणीय कवि केदारनाथ अग्रवाल ने कहा था कि फूल नहीं रंग बोलते हैं. इसलिए मैंने सोचा है कि रंगों के बहाने से बात शुरू की जाय. एक रंग हरा है- उड़द के पत्तों जैसा. गाढ़ापन लिए हुए. ललितपुर से हमीरपुर तक, सैकड़ों किलोमीटर केवल उड़द के खेत दीख पड़ते हैं. सावन के अंधे को केवल हरा दिखता है- जिसने भी यह कहावत बनायी होगी, हमारी वह पूर्वज इसी इलाक़े की रही होगी.

एक हरा रंग और है- तिल के पौधों वाला जो थोड़ा सा सफेदी लिए हरा होता है. अबकी बार जब हम बुंदेलखंड गए तो उड़द और तिल की फसल कट चुकी थी, खेत जोते जा चुके थे. धरती का रंग धूसर हो गया था. जिनके पास सिंचाई का साधन है, वे किसान नवम्बर के मध्य से अपने खेतों में गेंहू बोयेंगे. इसके कुछ ही दिन बाद धरती हरी होने लगेगी.

एक रंग गोबर का है. पढ़े-लिखे लोग इसे कैमल ब्राउन कहते हैं. ललितपुर से हमीरपुर जाते समय सड़क पर सुंदर गायों-बछड़ों-सांडों के झुंड के झुंड दिख जाते हैं. काली सड़क पर पीला-बादामी-कत्थई गोबर सड़क की नीरस कालिमा को भंग कर देता है.

पशुओं के झुंड सड़क पर रहने के लिए मजबूर हैं क्योंकि पिछले कई बरस से यह इलाका अन्ना प्रथा से आक्रांत है. इस प्रथा में किसान अपने जानवरों को मई-जून महीने में छुट्टा छोड़ देते थे और नाग पंचमी के दिन अपने घरों पर अवश्य ही बांध लेते थे. इसके बाद खेत मालिक जानवर को कांजी हाउस में बंद करा देते थे और जानवर के मालिक को जुर्माना देकर उसे छुड़ाना पड़ता था. कांजी हाउस धीरे-धीरे बंद हो गए.

इसी बीच चरागाह ख़त्म हुए, उन पर खेती की जाने लगी या अवैध कब्ज़ा हो गया. अब पशुओं का धावा जब खेत पर ज्यादा बढ़ा तो खेत के किनारे बाड़ लगायी जाने लगी है. बुंदेलखंड के खेत कंटीले तार से घेर दिए गए हैं, खेत के खाली होने पर भी पशु खेत में नहीं जा सकते हैं. किसान दयालु है लेकिन उसे अपना और देश का पेट भी तो पालना है तो इसलिए उसने खेत के चारों ओर कंटीले तार लगा दिए हैं. इसमें खर्चा लगता है. तीन बीघा खेत घेरने के लिए 100 किलो कंटीला तार की खपत होती है जिसकी कीमत 5500 से 7000 तक बैठ जाती है. सीमेंट या लकड़ी के खंबे लगाने की जरूरत पड़ती है. इससे खेती-किसानी की लागत बढ़ जाती है.

उत्तर प्रदेश में नयी सरकार आने से कुछ लोगों में गायों की रक्षा का भाव जगा है जबकि किसान परेशान हैं. वे एक ही समय में हिंदू हैं, भारतीय जनता पार्टी के मतदाता हैं और दयालु किसान भी हैं. अब करें तो क्या करें?

बुंदेलखंड के घर काफी सुंदर दीखते हैं. वे गोबर, गेरू, चूने में रंग मिलाकर पोते जाते हैं. मुझे लगता है कि बुंदेलखंड के ग्रामीण इलाकों को स्वच्छता के लिए प्रधानमंत्री को नकद पुरस्कार देना चहिए. ग्रामीणों को भी गाय पालने पर सब्सिडी दी जाए. उनसे कहा जाए कि आप अपनी गाय घर पर बांधें और उन्हें चारा-भूसा खिलाएं, खुले में न छोड़ें. किसानों को भूसा और पुआल बचाने के लिए प्रोत्साहित किया जाय. अभी तो बड़े किसानों का गेहूं और धान कंपाइन मशीन से कट जाता है. इससे उन्हें गाय पालने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा और खेत में गोबर की खाद पहुँचेगी. इससे उत्पादन बढ़ेगा. गौ-रक्षा दल केवल आतंक पैदा करते हैं- ऐसा प्रधानमन्त्री खुद कह चुके हैं. उनका खेती-किसानी और किसान से कुछ लेना देना नही है.

बुंदेलखंड का एक और रंग है- लाल

यह लाल जैसा लाल रंग नहीं है- जैसे किसी ने पान खा लिया हो, उसके ओठों वाली लाली इस लाल रंग में है. बुंदेलखंड के भूदृश्य का एक बड़ा हिस्सा इसी प्रकार की लाल मिट्टी और इसी रंग के कच्चे पहाड़ों का है. झाँसी और ललितपुर के बीच ऐसे ही एक लाल पहाड़ का पेट काटकर सड़क निकाल दी गयी है. कुछ पहाड़ पुरानी उम्र के हैं, वे स्लेटी रंग के हैं और उन्हें तोड़कर, खोदकर पत्थर निकाला जाता है. पत्थर तोड़कर गिट्टी बनायी जाती है. इन पहाड़ों की पूरी देह देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचकर लोगों के मकान में लग जाती है.

कुछ पहाड़ सफेद रंग के हैं. वे अभी थोड़ा सा बचे हैं. उनकी भी बारी आएगी. बुंदेलखंड में अलग-अलग पहाड़ों से अलग- अलग किस्म का पत्थर निकलता है. इसकी उपयोगिता भी अलग-अलग है. यहाँ पगडंडी, सड़क, चारदीवारी, खेत की मेड़ और अमीरों और गरीबों के घर इन्हीं पत्थरों से बने दिख जाएंगे. बुंदेलखंड पत्थरों से बना है.

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा ?

बुंदेलखंड को पानीदार समाज कहा जाता है. यहाँ के बुजुर्ग पानी का अर्थ दया, करुणा, वादे का पक्का होना बताते हैं. वे किसी क्रूर, निर्दयी और वादाखिलाफ़ आदमी के लिए केवल यही कहते हैं कि अमुक व्यक्ति के आँख का पानी मर गया है. लोग अपने जीवन में और धरती पर पानी चाहते हैं.

एक लंबे समय से बुंदेलखंड को यह पानी इस इलाके के तालाब उपलब्ध कराते रहे हैं. अंग्रेज़ अफसरों ने अपनी रिपोर्टों में इस इलाके के तालाबों के बारे में लिखा है. आज भी यहाँ तालाब दिख जाते हैं, लेकिन उतने नहीं जितने एक शताब्दी पहले होते थे. अनुपम मिश्र की खूबसूरत किताब ‘आज भी खरे हैं तालाब’ बताती है कि बुंदेलखंड में जब किसी को जातीय पंचायत कोई दंड सुनाती थी तो उससे तालाब बनाने को कहती थी. अगर कभी कोई इतिहासकार इस इलाके का पारिस्थितकीय इतिहास लिखे तो उसे अनुपम मिश्र की बात को ध्यान रखना होगा और इन तालाबों के किनारे कई-कई फेरे लगाने होंगे.

इस इलाके में पिछले तीस वर्ष में बड़ी संख्या में तालाब सूख गए या पाट दिए गए. जो बचे हैं, वे काफी सुंदर हैं, विशेषकर ग्रामीण इलाकों के तालाब जबकि कस्बों के किनारे के तालाब प्रदूषित हो गए हैं. अगस्त से अक्टूबर के महीने में इन तालाबों में खिले कमल के फूल और पुरइन के पत्ते उन्हें लाल और हरे रंग में रंग देते हैं. बुंदेलखंड के तालाबों में यह सिंघाड़ों का भी मौसम है. सिंघाड़ा प्रोटीन और कई औषधीय गुणों से पूर्ण कई-कई नोकों वाला फल है जो पानी में फलता है. यह तालाब के पानी को हरे और ललछहूँ रंग में रंग देता है. सिंघाड़ा निकालने के काम में मुख्यतः केवट और निषाद संलग्न रहते हैं, इसी से उनके घर का चूल्हा जलता है. वे मछली भी मारते हैं लेकिन अब तालाबों में पहले की अपेक्षा मछलियाँ कम मिलती हैं और उनकी किस्मों में भी कमी आयी है. इसके कई कारण हैं- साल में कई-कई बार शिकार पड़ना, निषादों की जनसंख्या बढ़ना और बहुत सारे तालाबों का सूख जाना.

बेतवा बहती रही

बुंदेलखंड की नदियों के रंग भी अलग हैं. एक ही नदी सुबह किसी दूसरे रंग में तो शाम को दूसरे रंग की हो जाती है. यह रंग नदी के तल पर भी निर्भर करता है, किसी नदी में लाल-कत्थई रंग के पत्थर हैं तो किसी में सफ़ेद रंग के, किसी नदी की तलहटी में रवेदार बालू है तो किसी की तलहटी में मोरंग.

हमीरपुर में यमुना और बेतवा के पानी का रंग अलग-अलग है. बेतवा के पानी का रंग धूसर है तो यमुना के पानी में हल्का सा हरापन है जैसे शैवाल का रंग होता है, कुछ वैसा ही. यमुना के पेट में से बालू निकलता है और बेतवा मोरंग की एक मोटी सी कालीन पर बहती है. इसी मोरंग से घर, सड़क और पुल बनता है. हमीरपुर में एक कहावत भी है कि इस जिले में जो भी आगे जाता है वह मोरंग के बल पर आगे जाता है. इससे नेता आगे गए, अफसर आगे गए, सिंडीकेट आगे गया और नदी के किनारे रहने वाले समुदाय पिछड़ गए. हमीरपुर के निषाद अपनी जीविका चलाने के लिए बेतवा नदी पर निर्भर हैं. बेतवा उनकी माँ है. वही उनका पेट भरती है.

हमीरपुर जिला मुख्यालय का दृश्य: यहां सुबह 4.30 से 8.00 बजे के बीच बेतवा से निकाली गयी मोरंग को नौजवान, औरतें और बच्चे ठेलिया से मुख्य सड़क तक लाते हैं. ठेलिया वास्तव में रिक्शे के ढांचे पर असेम्बल किया गया एक भारवाहन है जिसने भारत के गांवों और कस्बों से बैलगाड़ियों के गायब होने के बाद काफी महत्व प्राप्त कर लिया है. इसी प्रकार मोटर साइकिल है. इसने गाँव, क़स्बा और शहर की दूरी पाट दी है. करोड़ों-करोड़ लोग इससे रोजाना गतिशील होते हैं. जब मोरंग की 12 से 15 बोरियों से लदी ठेलिया महोबा-हमीरपुर मुख्य सड़क पर पहुँचती है तो उसे वहां से मोटर साइकिल चलाता हुआ व्यक्ति अपने एक पैर से धकेलते हुए आठ किलोमीटर दूर आनुपुर मोड़ ले जाता है. परंपरा और आधुनिक तकनीक का यह बेजोड़ दृश्य होता है.

यह ठेलिया और मोटर साइकिल निषादों की होती है. इनकी एक बस्ती ‘केसरिया का डेरा’ महोबा के बाएं किनारे पर बसी है जिसमें लगभग 400 से अधिक सदस्य इस समुदाय के हैं.

अशोक की उम्र 16 से 20 साल के बीच होगी(क्योंकि उन्हें कभी हाई स्कूल सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं पड़ी और याद भी नहीं है कि वे कब पैदा हुए थे). उनकी मां और छोटा भाई ठेलिया खींच कर सड़क तक लाते हैं और फिर वे इसमें अपनी मोटर साइकिल से धक्का लगाते हुए आनुपुर मोड़ ले जाते हैं. वहां एक बोरी मोरंग 50 से सत्तर रुपये में बिक जाएगी. कभी-कभार शहर के लोग आकर मुख्य सड़क पर ही मोरंग ले लेते हैं. हमीरपुर में सुबह-सुबह मोरंग खरीदना इतनी ही सामान्य बात है जितनी कि किसी सरकारी नौकरी से रिटायर्ड आदमी के लिए सुबह-सुबह दूध-ब्रेड खरीदना. हमीरपुर में यह एक सामान्य दृश्य है.

मोरंग ही सोना है

उत्तर प्रदेश में लोहा, कोयला, सोना और हीरा तो नहीं निकलता है लेकिन पिछले दो दशक में बालू और मोरंग ही सोना हो गया है. नेशनल हाईवे अथारिटी आफ इंडिया के गठन के बाद देश में बहुत तेजी से बालू, मोरंग और गिट्टी की खपत बढ़ी है. इसी बीच भवन-निर्माण के क्षेत्र में उछाल आया है. इससे बालू, मोरंग और गिट्टी के कारोबार में बड़े लोग कूद पड़े हैं. इसके पहले नदियों के गर्भ में पायी जाने वाली मोरंग और बालू के खनन पर निषाद और इनसे निकली जातियां जैसे मल्लाह, केवट, बिंद, निषाद, मांझी, बाथम, धीवर, तीमर, चाईं, सिरहिया, तुरहा, रैकवार, कैवर्त, खुल्वत, तियर, गौडिया, गोड़िया और काश्यप काबिज थे. इससे उन्हें पेट भरने भर का कुछ मिल जाता था. यहाँ तक कि यूपी माइनर एंड मिनरल कंसेशंस रूल, 1963 के नियम 9(2) बाकायदा नदियों से बालू और मोरंग निकालने के लिए वरीयता अधिकार ‘प्रिफरेंशियल राइट’ उन जातियों को देता है जो सदियों इस काम में संलग्न रही हैं.

तो इस प्रकार राज्य ने जाति और पेशे के संबंध को एक निश्चित सीमा के साथ मान्यता दी है. नदियों से बालू और मोरंग निकालने के लिए जो ठेका होता रहा था, वह अभी तक उपर्युक्त जातियों में किसी के नाम होता था लेकिन पैसा किसी माफिया का लगता था. जिसके नाम का ठेका आवंटित होता, वह दिहाड़ी मजदूर के रूप में बालू निकाल रहा होता था. इसके कारण पूरे उत्तर प्रदेश में बालू के खनन पर दबंग माफियाओं का कब्जा होता चला गया. यहाँ तक कि इसमें एक ‘सिंडीकेट’ चलने लगा. सबसे पहले सिंडीकेट को पूरे प्रदेश का ठेका अनौपचारिक रूप से मिलता था, इसके बाद वह ‘अपने लोगों’ को इलाक़े और नदियाँ बांट देता था. उसके यह लोग यह ठेका उन जातियों को देते थे जिन्हें ‘प्रिफरेंशियल राइट’ मिले होते थे. इनसे ठेका स्थानीय माफिया खरीद लेता था और मशीनों से बालू-मोरंग निकालता था.

इस पर न्यायालय भी खफा था यहाँ तक कि 12 जुलाई 2006 के अपने एक निर्णय में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने माफिया के बालू खनन पर कब्ज़े को लेकर चिंता जाहिर की थी. इलाहाबाद जिले में यमुना नदी के किनारे बसे गांवों के अपने अध्ययन में मैंने पाया है कि बालू के खनन पर अधिकार जमाने के लिए क्षेत्र की दबंग जातियों और निषादों के बीच संघर्ष दशकों से चल रहा है. यहाँ दबंग जातियों से जुड़े लोगों ने एक तरह से बालू के खनन पर पूरी तरह से कब्ज़ा जमाने का प्रयास किया है.

इस प्रकार का खनन न केवल लोगों की जीविका छीन लेता है बल्कि नदी का पारिस्थिकीय तंत्र भी नष्ट कर देता है. इससे चिंतित होकर अपने विभिन्न आदेशों में नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल ने मशीनी खनन पर रोक लगा दी है. उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव की सरकार के खिलाफ यह एक बड़ा मुद्दा बन गया था. योगी आदित्यनाथ की सरकार ने आते ही इसके खिलाफ कड़ा कदम उठाया और नदियों से बालू-मोरंग के खनन पर रोक लगा दी. बालू और मोरंग के खदान को पारदर्शी और भ्रष्टाचार विहीन बनाए जाने की बात की गयी. देखना यह है कि ऐसा कब होता है जब नदियों के ऊपर से माफिया का कब्ज़ा खत्म हो जाए. हमीरपुर के शहरी नागरिक जयसिंह एडवोकेट बताते हैं कि इसमें कमी आयी है लेकिन बेरी और पतारा घाटों के पास अभी भी ट्रकों पर गैर-क़ानूनी मोरंग लोडिंग होती है. घूस भी चलता है. हमीरपुर में 22 अक्टूबर को मुख्यमंत्री का आगमन था तो कुछ दिन पहले से यह लोडिंग बंद थी लेकिन उनके कार्यक्रम के मात्र कुछ दिन बाद यह रामकहानी फिर शुरू हो गयी.

(रमाशंकर सिंह, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला  में रिसर्च फेलो हैं )

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