कुम्भ मेले का लोगो : कला की सरकारी समझ का नायाब नमूना

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अख़बार में छपे फोटो से पहले तो मुझे यह लगा कि उत्तर प्रदेश के राज्यपाल और मुख्यमंत्री प्रयाग में 2019 में होने वाले कुम्भ मेले का पोस्टर जारी कर रहे हैं , पर खबर पढने  से पता चला कि यह पोस्टर नहीं बल्कि कुम्भ मेला- 2019 का आधिकारिक लोगो है । लोगो या प्रतीक चिन्ह मूलतः एक पहचान चिन्ह ही होता है जिसका सांकेतिक और कलात्मक होने के साथ-साथ व्यावहारिक होना जरूरी है जिससे उसकी प्रतिलिपि बनाना सहज ( रिप्रोड्यूसिबल) हो और किसी कार्यक्रम के प्रचार के लिए उसका व्यापक प्रयोग किया जा सके। कुम्भ 2019 का लोगो को देख कर यह तो स्पष्ट कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश सरकार की लोगो के इन पक्षों के बारे में न्यूनतम समझ भी नहीं है।

इस लोगो में तीन साधुओं को स्नान करते दिखाया गया है जिससे यह किसी साधुओं के समागम का प्रचार-पोस्टर सा लगता है जबकि सच तो यह है कि कुम्भ में भारत के कोने कोने से लाखों आम श्रद्धालु आते हैं , जिसके चलते यह इस देश के विभिन्न प्रांतों की जनता का मेल-मिलाप का मेला है । कुम्भ मेले के लोगो या प्रतीक चिन्ह में मंदिर का चित्रण अर्थ हीन सा लगता है क्योंकि कुम्भ का मूल आकर्षण स्नान है न कि कोई मंदिर दर्शन। इलाहबाद का कुम्भ मेला इसलिए भी अन्य सभी मेलों से ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि यह गंगा और यमुना के संगम पर आयोजित होता है। प्रतीक चिन्ह में इन दोनों नदियाँ , खोजने पर ही दिखाई देती है। पर इन सबों के अलावा , सबसे दुर्गति इस प्रतीक चिन्ह में आम श्रद्धालुओं की हुई है , जिसे नदी के तट पर एक भीड़ के रूप में आप तभी देख सकते है , जब यह प्रतीक चिन्ह विशाल आकार में कहीं प्रकाशित हो । अखबार , पत्रिका या अन्यत्र जहाँ भी इस लोगो को छोटे आकार में छापा जायेगा , जनता चींटियों की भीड़ जैसी भी नहीं दिखाई देगी , बल्कि कुछ अष्पष्ट और अर्थहीन रंगीन बिंदुओं की उपस्थिति सी लगेंगी ।
यह लोगो या प्रतीक चिन्ह नितांत अव्यवहारिक , अज्ञानी और कला-विरोधी व्यवस्था की पैदाइश है, जिसने केवल कुंभ मेले के साथ ही अन्याय नहीं किया है , बल्कि प्रदेश में सौ वर्षों से अधिक समय से सक्रिय लखनऊ कला विद्यालय , बनारस , आगरा और इलाहाबाद विश्वविद्यालय एप्लाइड आर्ट के विभागों की योग्यता की भी अवहेलना की है। इस लोगो से भविष्य के लिए सरकार को यह सबक लेनी चाहिए कि कला के बारे में समझ न तो प्रशासनिक परीक्षा पास करने से हासिल होती है और न ही चुनाव जीतने से, लिहाज़ा कला के क्षेत्र में अपने को सर्वज्ञानी साबित करने की कोशिश ऐसी हास्यास्पद परिस्थितियों को ही जन्म देंगी , जिसे इतिहास से मिटाना असंभव होगा।

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