कासगंज साम्प्रदायिक हिंसा के आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं और निर्दोष जेल में हैं

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कासगंज में दंगा नहीं अल्पसंख्यकों पर योजनाबद्ध राजनीति प्रेरित साम्प्रदायिक हमला

 भीड़ के हमले का शिकार मजदूर  छोटन अलीगढ़ में आईसीयू में मौत से जूझ रहा

कासगंज साम्प्रदायिक हिंसा पर ऑल इंडिया पीपल्स फोरम की जाँच टीम ने रिपोर्ट जारी की

ऑल इंडिया पीपल्स फोरम की जाँच टीम ने कासगंज का दौरा करने के बाद आज अपनी रिपोर्ट जारी की. जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कासगंज में दंगा नहीं हुआ बल्कि अल्पसंख्यकों पर योजनाबद्ध राजनीति प्रेरित साम्प्रदायिक हमला था. दंगे के दोषी खुलेआम घूम रहे हैं जबकि दोनों समुदाय के निर्दोष जेल में हैं.

पुलिस और प्रशासन पूर्वाग्रह से ग्रस्त है और उसकी कार्रवाई एकतरफा है. धर्म और जाति के आधार पर कर्रवाई की जा रही है. चन्दन गुप्ता की हत्या में कई लोगों को आरोपित बनाया गया और गिरफ्तार किया गया लेकिन गरीब मजदूर छोटन पर जानलेवा हमला करने वाले और अकरम सिद्दीकी की आंख फोड़ने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई. छोटन अलीगढ में आज भी अस्पताल में पड़ा मौत से जूझ रहा है लेकिन उसे न कोई सरकारी मदद दी गई और न कोई हाल- पूछने आया.       जाँच दल ने आज नई दिल्ली में एक प्रेस कांफ्रेंस में अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए कासगंज में हिंसा की न्यायिक निगरानी में न्यायिक जाँच की मांग की. जाँच टीम ने भड़काऊ भाषण देने वाले भाजपा सांसद और अन्य नेताओं को गिरफ्तार करने , बाइक पर हथियारबंद होकर हिंसा करने वाले एबीवीपी-संकल्प से जुड़े लोगों पर एफआईआर दर्ज कर गिरफ्तार करने और जेल में बंद दोनों समुदायों के निर्दोष लोगों को रिहा करने की मांग की.

जाँच दल ने जोर देकर कहा कि कासगंज की स्थिति अभी भी तनावपूर्ण है और अल्पसंख्यक अब भी बहुत डर में जी रहे हैं, फिर भी कासगंज में मुसलमानों की रक्षा के लिए हिंदुओं द्वारा सहायता के कई उदाहरण मौजूद हैं। कासगंज की स्थिति सामान्य हो सकती है अगर हिंसा करने वाले एबीवीपी और संकल्प के लोगों को गिरफ्तार कर लिया जाए, और हिन्दू और मुसलमानों को शांतिपूर्वक एक दूसरे के साथ बातचीत करने के लिए ठोस प्रयास किए जाएं।

एआईपीएफ की जाँच दल में वरिष्ठ पत्रकार और कार्यकर्ता जॉन दयाल व किरण शाहीन, कार्यकर्ता लीना दबीरू, एपवा की सचिव कविता कृष्णन, किसान महासभा के उपाध्यक्ष प्रेम सिंह गहलौत (सभी एआईपीएफ के केंद्रीय अभियान दल के सदस्य हैं)  के साथ ही आइसा (जेएनयू ) के कार्यकर्ता विजय कुमार और तबरेज़ अहमद शामिल थे .

जाँच टीम ने 5 और 6 फ़रवरी को कासगंज जिला का दौरा किया था . पुलिस ने टीम को स्वतंत्र रूप से काम करने में रुकावट डाली और 6 फरवरी को कासगंज जिला जेल के पास टीम को रोक दिया तथा  धारा 144 के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए एक घंटा तक सभी लोगों को महिला पुलिस थाने में हिरासत में रखा. इसके बाद अपने घेरे में रखते हुए जिले के बाहर भेज दिया गया. इसके बाद टीम ने अलीगढ़ जाकर अकरम से मुलाकात की, जो भीड़ हमले में अपनी एक आँख गँवा चुके थेऔर छोटन जो 28 जनवरी से जेएन मेडिकल कॉलेज अस्पताल अलीगढ़ में बेहोश पड़े हैं.

जाँच टीम की रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

भीड़ के हमले में घायल अलीगढ़ में अस्पताल में जीवन और मौत से जूझ रहा है छोटन

45 वर्षीय छोटन 28 जनवरी  की दोपहर को कासगंज के पास गंज दंडवारा में अपनी साइकिल से निकला था. वह चिकन स्टॉल लगाकर जीविकोपार्जन करता था. कासगंज में अशांति के कारण दो दिन से वह अपना रोजगार नहीं कर पा रहा था. उसके पास पैसे खत्म हो गए थे और परिवार की रोजमर्रा की जरूरत के लिए उसे अपना ठेला लगाना जरूरी था ताकि कुछ पैसे जुटा सके. वह घर में एकमात्र कमाई करने वाला सदस्य है. घर में पत्नी शहनाज, छोटे बेटे और बेटी हैं. अपने मरहूम भाई के तीन बच्चों की जिम्मेदारी भी उसी पर है.

 

जब वह रात बीतने पर भी नहीं लौटा , तो उसकी पत्नी ने पड़ोसियों से सहायता माँगी , जिन्होंने उसके लिए छोटन को खोजने के लिए एक जीप की व्यवस्था की। छोटन छितेरा में सड़क के किनारे झाड़ियों में पड़ा मिला. हमलावर जीप को पुलिस की जीप समझकर भाग गए। छोटन के सिर पर  गंभीर चोट थी और वह बेहोश था.  वह इस वक्त जेएन मेडिकल कॉलेज अस्पताल, अलीगढ़ के आईसीयू में है। उसे सिर की सर्जरी करानी पड़ी, और वह वेंटिलेटर पर था. अब वह वेंटिलेटर पर नहीं है लेकिन अभी भी गंभीर हालत में है और बेहोश है। इस मामले में एक प्राथमिकी दर्ज की गई है लेकिन छोटन पर इस जानलेवा हमले के आरोपियों को खोजने के लिए पुलिस ने कोई प्रयास नहीं किया .

एक असहाय मजदूर, जो किसी भी जुलूस या हिंसा का हिस्सा नहीं था, और जिसकी केवल गलती है कि वह एक गरीब मुसलमान है जो अपनी जीविका के लिए निकला था ? जिला प्रशासन और उत्तर प्रदेश की सरकार ने छोटन और उनके परिवार की कोई मदद नहीं की है जबकि वह अपने घर का एकमात्र कमाऊ सदस्य है और यदि वह बचता है, तो भी उसके काम लायक होने की संभावना नहीं है.

निर्दोष  जेल में

टीम ने कासगंज जिला जेल का दौरा किया, जहां जेलर और जिला प्रशासन ने टीम को कैदियों से मिलने, यहाँ तक कि बात करने से भी मना कर दिया। टीम ने उन परिवारों के सदस्यों से मुलाकात की जो जेल में बंद रिश्तेदारों से मिलने के लिए बाहर प्रतीक्षा कर रहे थे। जाँच टीम के सदस्य कई हिंदू और मुस्लिम परिवारों से मिले , जिनके रिश्तेदारों को पूरी तरह निर्दोष और हिंसा की घटना से दूर -दूर तक कोई रिश्ता न होने के बावजूद जेल में रखा गया था।

अनुज तोमर के खिलाफ एसएचओ की एफआईआर

-आलोक तोमर ने टीम को बताया कि उनके भाई अनुज तोमर को 27 जनवरी 2018 की दोपहर केनरा बैंक लेन, लवकुश नगर, कासगंज, में उसके घर के पास से उठाया गया था. उस वक्त वह अपने बीमार पिता के लिए दवा खरीदने के लिए निकले थे। अनुज ने 26 जनवरी का दिन सोकर बिताया क्योंकि उसके दोस्तों ने अशांत माहौल की वजह से उसे बाहर न निकलने की नसीहत दी थी। वह 27 जनवरी को नजदीकी मेडिकल स्टोर पर दवा लेने गया. पुलिस ने उनसे कहा कि सभी दुकानों को बंद कर दिया गया है इसलिए वह वापस लौट जाय। जैसे ही वह जाने के लिए मुड़ा पुलिस की कई गाड़ियाँ वहां आयीं और उसे पकड़ ले गईं. उन्हें अपने परिवार को सूचित करने का भी मौका नहीं दिया गया. एसएचओ रिपुदमन सिंह द्वारा लिखाई गई एफआईआर में कहा गया है कि अनुज को 27 जनवरी को 11.40 बजे गिरफ्तार किया गया था जब वह भीड़ के साथ आगजनी (आमापुर अड्डा में)  और फर्नीचर की दुकान में तोड़-फोड़ में शामिल था.

 

राजवीर सिंह

-राजवीर सिंह यादव ने रोते हुए बताया कि उनका बेटा डॉ नवीन गौर की क्लिनिक में कंपाउंडर है। 27 जनवरी को वह और एक अन्य कंपाउंडर, इस चेतावनी के बाद कि दुकान खोलना सुरक्षित नहीं होगा, क्लिनिक का शटर बंद कर रहे थे . इसी समय पुलिस आई और दोनों को गिरफ्तार कर लिया. राज का सहयोगी जो लोध राजपूत (एलआर) जाति से संबंधित हैं ( जिस जाति के बीजेपी के मौजूदा सांसद राजबीर सिंह और वीएचपी राज्य अध्यक्ष प्रमोद जाजू हैं ) को धारा 151 के तहत गिरफ्तार कर जमानत पर रिहा कर दिया गया  जबकि राज को धारा 147, 148, 14 9, 336, 436, 427, 34 आईपीसी और यूएपीए की धारा 7 के तहत गिरफ्तार कर लिया गया. एसएचओ रिपुदमन सिंह द्वारा दर्ज प्राथमिकी में दावा किया गया है कि घंटाघर में दोपहर में राज की पहचान और उसकी गिरफ्तारी हुई थी, जहां वह भीड़ के साथ जूते की एक दुकान पर आगजनी और तोड़फोड़ में शामिल था। राजवीर सिंह बताते हैं कि एफआईआर में राज की ‘ पहचान’ का दावा किया गया है , लेकिन एफआईआर में उसके पिता का नाम या पूर्ण पते का उल्लेख नहीं है, केवल ‘राज, पैसोई, सोरन, काशीराम नगर  दर्ज है।

 

फिरोज

फ़िरोज़ ने जार-जार रोते हुए बताया कि उनके बेटे इमरान खान, जो बिलराम गेट पर मीट शाप और होटल चलाते हैं, को पुलिस ने सड़क से उठा लिया। फिरोज गुजरात में मजदूरी करते हैं . बेटे की गिरफ्तारी की खबर मिलने पर वह वहां से लौट आये. फिरोज कहते हैं कि इमरान न तो अब्दुल हमीद चौक में झंडारोहण की घटना में और न ही किसी भी तरह की हिंसा में शामिल था।

 

 

 

 

अब्दुल हामीद चौक पर  बाइक छोड़ भागे लोग कौन हैं ?

युवा जिलाध्यक्ष की बाइक

जब टीम के सदस्यों ने राजवीर से पूछा कि असली अपराधी कौन थे तो उन्होंने कहा कि  ‘ एबीवीपी-संकल्प के लोग ‘ तिरंगा यात्रा ‘ में मोटर बाइकों पर सवार थे और उन्होंने अब्दुल हमीद चौक पर तिरंगा फहराने वाले मुसलमानों से भगवा झंडा भी फहराने को कहा. इसका मुसलमानों ने विरोध किया फलस्वरूप संघर्ष में एबीवीपी के लोगों ( जिनके पास उस समय बंदूकें नहीं थी ) को भागने को मजबूर होना पड़ा. कई दर्जन मोटरबाइक्स ( लगभग 60 के आसपास )  वहीँ छूट गई  जो अब पुलिस स्टेशन में हैं।

बीजेपी बाइक

वही लोग बाद में भाजपा नेताओं से मिले और पुनः समूह बनाकर, बंदूकें और हथियारों से सज्जित होकर तहसील की ओर बढ़े जहां चंदन की लाश पाई गई थी। पुलिस ने उन लोगों में से एक को भी क्यों नहीं गिरफ्तार किया है,  जो उन मोटरबाइक्स के मालिक हैं. ये लोग निश्चित रूप से हिंसक भीड़ का हिस्सा थे, जिन्होंने कासगंज की शांति को नष्ट कर दिया. यदि ये लोग पकड़े गए होते तो वे अपने दूसरे साथी की पहचान भी कर सकते हैं। इसके बजाय पुलिस बस निर्दोषों को उठा रही है। ‘

जाँच टीम के पास पुलिस थाने पर पड़ी लगभग 50  मोटरबाइकों के नम्बर प्लेटों की तस्वीरें हैं जो अब पुलिस स्टेशन पर पड़ी हैं। जाँच टीम राजवीर से सहमत हैं कि  कासगंज के वास्तविक दोषियों की पहचान करने के लिए बाइक मालिकों की पहचान जरूरी है।

अन्य निर्दोष

-दो युवा बहनों माहेरू और महक ने हमें बताया कि उनके पिता 65 वर्षीय नसीरुद्दीन अपनी चावल की दुकान पर थे जब उन्हें 28 जनवरी को पुलिस ने उठाया था। उनका 16 वर्षीय भाई नहा रहा था. उसको भी कपड़े पहनाकर पूछताछ के बहाने उठा लिया गया. दोनों पर धारा 302 और 307 के तहत मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि 16 वर्षीय नौजवान को जेजे अधिनियम का उल्लंघन करते हुए वयस्क जेल में रखा गया है। उनकी मां पिछले चार महीनों से लकवाग्रस्त हैं और बेटे व पति की गिरफ्तारी के बाद से बेहोशी की हालत में हैं.

-रिक्शा खींचने वाले शमशाद पर भी झूठा आरोप लगाया गया है. चश्मदीद बताते हैं कि अगर 26 जनवरी को सेंट जोसेफ स्कूल के बाहर सीसीटीवी कैमरे की जांच की जाय तो साफ पता चल जयेगा कि शमशाद अपने बच्चे को गणतंत्र दिवस समारोह के लिए स्कूल छोड़ने आया था.

-एक मस्जिद से पुलिस द्वारा पकडे युवा टेम्पो चालक मोहसिन को जेल में बंद कुछ कैदियों द्वारा पीटे जाने की भी खबर है.

पुलिस का पूर्वाग्रह

जाँच टीम को पुलिस के जाति और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह की कई घटनाएँ   मिलीं. कई लोगों ने बताया कि युवाओं को पुलिस द्वारा अंधाधुंध गिरफ्तार किया जा रहा था और उनका जाति व धर्म देखकर तय किया गया कि उन पर किस धारा के तहत मुकदमा दर्ज होगा।  लोध राजपूत और अन्य ऊपरी जाति के हिन्दुओं पर  आम तौर पर धारा 151 के तहत मुकदमे  दर्ज किए गए और जमानत पर रिहा कर दिया गया. ओबीसी और दलितों पर धारा 147, 148, 14 9, 336, 436, 427, 34 आईपीसी और यूएपीए की धारा 7 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया  और मुसलमानों पर उपरोक्त के अलावा अतिरिक्त रूप से धारा 307 ( हत्या का प्रयास ) और कुछ मामलों में 302 (हत्या) के मुकदमे दर्ज किए गए। जब मुसलमानों के किसी भी पूर्व-योजनाबद्ध हत्या के इरादे से कोई कार्य और संगठित हिंसा के कोई सबूत नहीं है, तो उन्हें चंदन गुप्ता की हत्या और अन्य लोगों की हत्या की कोशिश  के लिए क्यों जिम्मेदार ठहराया जा रहा है ? अकरम ने एक आँख खो दी,  नौशाद ने अपनी जांघ में एक गोली खाई,  छोटन जानलेवा हमले का शिकार हुआ – फिर भी इन हमलों के लिए किसी को भी हत्या के प्रयास में गिरफ्तार नहीं किया गया- जो एक बहुत अहम सवाल है.

आगजनी, तोड़फोड़ और लूट की शिकार दुकानों की सूची

टीम को 30 संपत्तियों (दुकानों, घरों, मस्जिदों) की आंशिक सूची दी गई , जिनमें आगजनी, तोड़ फोड़  और लूट की गई . कम से कम 15 और ऐसी दुकानें हैं जिसके बारे में बताया जा रहा है कि वे आगजनी, तोड़ फोड़ और लूट का निशाना बनीं। टीम को बताया गया कि इनमें से अधिकतर मामलों में पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर रही है। ध्यान दें कि हिंदुओं और मुसलमानों ने समान रूप से हमें बताया कि किसी हिन्दू दुकान या मंदिर को किसी भी आगजनी या हिंसा का शिकार नहीं बनाया गया।कम से कम तीन मस्जिदों को जला दिया गया और लूट लिया गया। 6  फरवरी की सुबह भी, गंजदंडवारा में एक मस्जिद को जला दिया गया था. इस घटना की रिपोर्ट 7 फरवरी को स्थानीय अख़बारों में आई है।

पुलिस का पूर्वाग्रह और गर्मजोशी से लबरेज एक दोस्ती

पुलिस के पूर्वाग्रह के सबसे चौंकाने वाले मामलों में से एक है बदायूं के दो दोस्तों  खालिद और प्रदीप की कहानी । उनके वकील हासिन अहमद ने हमें बताया कि खालिद (मन्नान खान के बेटे) और प्रदीप (चतुरी का बेटा), दोनों बदायूं जिले के थाना सहवासन के अंतर्गत शाहबाजपुर से कासगंज के लिए एक स्कूटर पर बिलराम कस्बा में खालिद की दादी को देखने जा रहे थे । पुलिस ने उन्हें रोक दिया। खालिद पर  (एफआईआर नंबर 59/2018)  धारा 307, 147, 148, 14 9, 336, 436, 427, 34 आईपीसी और यूएपीए की धारा 7 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया जबकि प्रदीप पर केवल 151 सीआरपीसी के तहत मुकदमा दर्ज किया गया और जमानत पर रिहा होने की पेशकश की गई थी लेकिन प्रदीप ने रिहा होने से इनकार कर दिया. उसने अपने दोस्त खालिद के साथ जेल जाने का विकल्प चुना।

चन्दन गुप्ता को किसने मारा

चन्दन गुप्ता की मृत्यु को लेकर चारों ओर कई सवाल है

-कई लोगों ने जाँच टीम को बताया कि तहसील के पास जिस जगह से चन्दन की लाश पाई गई बताई जाती है वहां पर खून के कोई धब्बे नहीं मिले

-प्रत्यक्षदर्शियों ने कहा कि 26 जनवरी को, एबीवीपी-संकल्प जमात अपनी बाइक पर तहसील तक बंदूकें और अन्य हथियार के साथ सांप्रदायिक नारे लगाते हुए गई लेकिन वे तहसील से आगे नहीं बढे.

-मुख्य आरोपी सलीम के घर के सामने जीजीआईसी स्कूल है, जहां दोनों समुदायों के माता-पिता अपनी बेटियों को लेने के लिए इकट्ठे होते हैं। दोनों समुदायों के माता-पिता, एबीवीपी भीड़ की फायरिंग को देखते हुए, अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए डर गए थे और उन्होंने भीड़ को भगाने के लिए पत्थर फेंकना शुरू कर दिया।

-बारकी क्लॉथ शॉप के मालिकों सलीम और उनके दो भाई पर चंदन गुप्ता की हत्या का आरोप है – केवल सलीम को अभी तक गिरफ्तार किया गया है। लेकिन कई सवाल इस आरोप को लेकर भी हैं।

-पुलिस का दावा है कि चंदन को मारने वाली गोलियों को सलीम की बालकनी या छत से चलाया गया था – लेकिन सलीम के घर से उस स्थान की दूरी जहां चंदन की लाश मिली थी, इसे संदेहास्पद बनाती है। इसके अलावा, जिस तरह से चन्दन को गोली लगी बताई जाती है उससे यह नहीं लगता कि गोली इतनी दूर किसी छत से चलाई गई है।

जाँच टीम को बताया गया था कि पुलिस ने पत्रकारों की मौजूदगी में  सलीम के घर से कुछ प्राप्त किया जिसे उसने  अमेरिका निर्मित बंदूक बताया जिसका उपयोग चन्दन पर गोली चलने के लिए किया गया था। बाद में पत्रकारों की उपस्थिति में यह तथाकथित ‘ बंदूक ‘ एक खिलौना निकली। सलीम से सम्बंधित दो लाइसेंसी बंदूकें भी उनके घर से बरामद की गईं लेकिन चंदन के शरीर में पाई जाने वाली गोली 12-बोर की इन बंदूकों से मैच नहीं करती। उसके बाद पुलिस ने दावा किया है कि चंदन को एक देशी कट्टा से मारा गया था.  इस तरह की एक बंदूक में इस दूरी से गोली मारने की क्षमता नहीं होती  और यह भी सवाल है कि दो लाइसेंसी बन्दूक का मालिक किसी को मारने के लिए देशी कट्टे का प्रयोग क्यों करेगा ?

– सलीम की गणतंत्र दिवस के दिन चौधरी मेहंदी हसन स्कूल मुल्का रोड पर होने की तस्वीरें हैं । वह कथित तौर पर अपने घर के पास तहसील में हुए टकराव के दृश्य से बहुत दूर थे। उनके भाई वसीम भी आरोपी हैं जो पिछले एक-डेढ़ महीने के लिए एक समूह के साथ ‘जमात’ (धार्मिक यात्रा) पर दूर हैं और 26 जनवरी को औरंगाबाद ( महाराष्ट्र) में थे।

– कई लोगों ने आरोप लगाया कि व्यापारिक शत्रुता के कारण सलीम, नसीम और वसीम को चंदन गुप्ता की हत्या में फंसाया जा रहा है क्योंकि उनकी दुकान बरकी क्लॉथ शॉप बहुत सफल है।

– सभी संबंधितों का ऐसा मानना है कि चंदन को न्याय मिलना चाहिए और उनके हत्यारों को दंडित किया जाना चाहिए. उन्होंने यह भी बताया कि चंदन का एक आपराधिक इतिहास है। उनकी मौत के कुछ हफ्ते पहले उन्हें कथित तौर पर जमानत पर रिहा कर दिया गया था. उन पर दहेज के लिए अपनी भाभी को जलाने का आरोप था. वह एबीवीपी-संकल्प कैडर के रूप में भी जाना जाता रहा है।

अकरम सिद्दीकी भगवा गुंडों के हमले में गंवाई आँख, हिन्दुओं ने जन बचायी

अकरम सिद्दीकी

टीम ने अलीगढ़ में अकरम सिद्दीकी से उसकी ससुराल में मुलाकात की. अकरम की बीवी ने 26  जनवरी को उस पर हमले के बाद एक बच्ची को जन्म दिया. अकरम ने बताया कि वह लखीमपुर खीरी से अलीगढ़ अपनी गाड़ी में अपने एक घरेलू नौकर के साथ अपनी बीवी की डिलीवरी के लिए जा रहा था। जब उसने कासगंज में प्रवेश किया  तो वह चाय की दुकान पर रुक गया. शुक्रवार का दिन था और उसे 6.45 बजे नमाज अता करनी थी। चाय दुकानदार हिंदू था. उसकी दुकान में शंकर जी की बड़ी तस्वीर लगी थी.  दुकानदार ने अकरम को दुकान के अन्दर वाले हिस्से में बिठाया और चाय बनने तक अकरम को नमाज पढ़ने के लिए कहा। दुकानदार ने अकरम को बताया कि शहर में तनाव है। अशांति की प्रकृति के बारे में पूछे जाने पर उसने कहा कि यह एक ‘ हिंदू-मुस्लिम दंगा ‘ है. दोनों व्यक्ति इस विडंबना पर मुस्कराए कि एक मुस्लिम ने एक हिन्दू की दुकान में नमाज पढ़ी, जबकि दूसरे लोग सांप्रदायिक हिंसा फैला रहे थे.

अकरम सिद्दीकी की क्षतिग्रस्त गाड़ी

अकरम चले गए . नादरी गेट के पास उन्होंने पुलिस बैरीकेड और भीड़ को देख अपनी गाड़ी धीमी कर ली. उन्हें लगा कि पुलिस ने यातायात बंद कर दिया है। उसने खिड़की खोली और सड़क पर एक आदमी से पूछा कि क्या वह अलीगढ़ के लिए सही रास्ते पर हैं। उसकी दाढ़ी और कपड़ों को देखकर और यह जानकर कि वह मुसलमान था, उस आदमी (हिंदू) ने उसे बताया कि आगे दंगाई हैं , जल्दी वापस लौट जाओ ।’ उस दिन अकरम को धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं की सदिच्छा का परिचय मिला जिस दिन उसने राजनीति प्रेरित सांप्रदायिक समूह के हाथों अपनी एक आँख गंवाई थी . अकरम के गाड़ी घुमाने से पहले ही भीड़ ‘दो हिन्दुओं की हत्या मुसलमानों द्वारा की गई है’ यह कहते हुए उसकी हत्या करने पहुँच गई . अकरम की यह दलील कि वह अपनी पत्नी की डिलीवरी के लिए जा रहा था, व्यर्थ हो गई। भीड़ ने उसकी आंख पर बंदूक की बट से जोरदार हमला किया। कुछ देर बाद कुछ लोगों ने कहा कि बहुत हो गया अब बस और हिंसा रुक गई ।बैरीकेड के पास तैनात पुलिस ने न तो ऊँगली उठाई और न भीड़ को हटाया और न ही अकरम को बचाने के लिए हमलावरों को रोका . जब अकरम पुलिस के पास गया और मदद की गुहार की तो एक पुलिसकर्मी ने कहा, ‘आज तुम्हारे लिए कोई सहायता नहीं है।’ लेकिन कुछ वरिष्ठ अधिकारी आए और उन्होंने अधीनस्थों को निर्देश दिया कि वे अकरम को अस्पताल ले जाएं। अकरम ने अपनी कार छोड़ने से इनकार कर दिया  और खुद कार चलाकर अस्पताल पहुंचा। प्राथमिक चिकित्सा प्राप्त करने के बाद, वह केवल एक आंख के साथ अलीगढ़ लौट आया. अकरम ने कहा कि वह सर्वशक्तिमान के प्रति आभारी है कि उसकी कृपा से नवजात बेटी को देखने के लिए उसकी एक आंख बच गई। उन्होंने कहा कि उन्होंने केवल एक ही बात पर दुख महसूस किया, ” मैं एक भारतीय हूं .  कासगंज,  अलीगढ़ या लखीमपुर खीरी जिला प्रशासन से कोई भी व्यक्ति मुझे देखने क्यों नहीं पहुंचा ?

जाँच टीम की मांग 

-कासगंज की घटना की न्यायिक निगरानी में न्यायिक जांच जरूरी है। यदि यह नहीं होता है तो यह स्पष्ट है कि मुख्य अपराधियों को छोड़ने की साजिश की जा रही है, क्योंकि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा से जुड़े ज्यादातर एफआईआर अज्ञात लोगों के खिलाफ हैं .

– निर्दोषों की गिरफ्तारी न्याय की राह में बाधक है . ऐसे लोग जिनके खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं हैं उन्हें छोड़ा जाना चाहिए और उनके खिलाफ केस वापस लिया जाए. .

– घायल लोगों के परिवारों को तत्काल मुआवजा दिया जाए, और हिंसा के अपराधियों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार किया जाए. 26 जनवरी को अब्दुल हमीद चौक में मिली बाइक के मालिकों, साथ ही तहसील के वीडियो फुटेज में दिखने वाले एबीवीपी-संकल्प के लोगों को बिना किसी देरी के गिरफ्तार किया जाए। इन संगठनों के नेताओं को घटना की आपराधिक योजना के षड्यंत्र के आरोप में गिरफ्तार करके जेल भेजा जाए। कासगंज के सांसद सहित भाजपा नेताओं को, जिन्होंने भड़काऊ भाषण दिए, गिरफ्तार किया जाए और उन्हें बिना देरी के जेल भेजा जाए।

– किशोर न्याय बोर्ड के सदस्यों की एक टीम के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों को बिना किसी देरी के जेल में बंद सभी लोगों से मिलने की अनुमति दी जानी चाहिए ताकि यह सत्यापित किया जा सके कि क्या कोई किशोर, वयस्क जेल में है या नहीं और क्या किसी भी कैदी पर किसी अन्य कैदी ने हमला किया है या नहीं .

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