उदारमना संस्कृति का सामर्थ्य

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पंकज चतुर्वेदी: मशहूर कथन है कि ”Interpretation depends on intention.” यानी व्याख्या इरादे पर निर्भर है। अगर आपकी नीयत नफ़रत और हिंसा फैलानेे की है, तो आप इतिहास से वे ही तथ्य चुनकर लायेंगे, जिनसे ऐसा किया जा सकता हो। ऐसा नहीं है कि वे तथ्य नहीं हैं, लेकिन समग्र सत्य की सापेक्षता में देखे जाने पर तथ्य सत्य नहीं रह जाते। इसलिए किसी ख़ास मक़सद या निहित स्वार्थ की नज़र से इतिहास का चयनधर्मी इस्तेमाल इतिहास नहीं है। सत्य से न्याय तभी हो सकता है, जब तथ्यों के अंतरसंबंधों को अनावृत किया जाय, उन्हें एक-दूसरे की रौशनी में देखा जाय।

अंग्रेज़ों की आलोचना इसलिए की जाती है कि उन्होंने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनायी और हिंदुस्तान में साम्प्रदायिक वैमनस्य और दंगे-फ़साद की शुरूआत की : इस हद तक कि 1947 में देश का त्रासद विभाजन करा देने में वे कामयाब हुए। मगर इस आलोचना का नैतिक अधिकार आपको तभी है, जब आप ख़ुद साम्प्रदायिक भेदभाव और रंजिश की राजनीति न करते हों !

विभाजन के बावजूद स्वाधीन भारत की संस्कृति अपने चरित्र में बहुलतावादी, सामासिक और संवादधर्मी है। इस विविधता में ही उसकी शक्ति और सौंदर्य है। इससे विच्छिन्न होकर वह आत्महीन और असह्य हो जायेगी। मन का उत्थान प्रेम में है और उसका पतन दुर्भावना में। इतिहास का सार यह है कि मनुष्यता प्रेम की बदौलत अपनी जय-यात्रा को निरंतर गतिमान रख सकी है और जब भी इस लक्ष्य से हम चूके, बहुत दुर्गति और विनाश हुआ। शायद इसी ख़तरे के मद्देनज़र अदम गोंडवी अपनी ग़ज़ल में कहते हैं :

”हिंदू या मुस्लिम के एहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुर्सी के लिए जज़्बात को मत छेड़िये।

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये।

छेड़िये इक जंग, मिल-जुलकर ग़रीबी के ख़िलाफ़
दोस्त मेरे, मज़हबी नग़्मात को मत छेड़िये।”

बावजूद इसके कि भावनात्मक निगाह से ये शे’र बहुत अच्छे और लोकप्रिय हैं, ”हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है”—-यह कोई दफ़्न करने लायक़ बात नहीं, दिन के उजाले में समझने, सराहने और गर्व करने योग्य सचाई है : हमारी संस्कृति की वह विशेषता, जिसकी बदौलत यह निरंतर ऊर्जस्वित और विकसित होती रही है। विभिन्न देशों से न जाने कितनी जातियाँ यहाँ आयीं और उनकी परिणति इस संस्कृति को व्यापक, बहुआयामी और सशक्त बनाने में हुई। यह भारत की उदारमना संस्कृति का ही सामर्थ्य है कि कोई इसे उच्छिन्नमूल न कर सका, बल्कि विश्व-कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के शब्दों में सभी इस देश-रूपी ‘महामानव-समुद्र’ में आकर ‘एक देह में लीन’ हुए :

“मेरे मन हे, पुण्य तीर्थ जगो !

कोटि-धार दुर्वार स्रोत में
आये मनुज-समुच्चय
कहाँ-कहाँ से किस पुकार पर ?
आकर हुए यहीं लय।

आये आर्य, द्रविड़, अनार्य, शक,
या चीनी प्राचीन,
हूण, मुग़ल, अफ़ग़ान—हुए सब
एक देह में लीन।

अब पश्चिम ने खोल दिये हैं द्वार,
सभी वहाँ से लाते हैं उपहार,
देंगे लेंगे, मिले-मिलायेंगे
ज्यों नीर-क्षीर,
इस भारत में महा-मनुज के
सागर-तीर।”

(युवा कवि और आलोचक पंकज चतुर्वेदी सागर विश्वविद्यालय, म.प्र. में पढ़ाते हैं ।)


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