उत्तर प्रदेश जहाँ हर दस में से चार बच्चा कुपोषित है

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नवम्बर 2017 महीने के दूसरे सप्ताह में देवरिया से खबर आई कि कुपोषण, भूख और बीमारी से मजदूर पशुपति के दो बच्चे खुश्बू (7) और अजय (5) की 9 नवम्बर को मौत हो गई। दोनों बच्चे 16 अक्टूबर से बीमार थे। पशुपति उन्हें इलाज के लिए लार सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र ले गया जहां से उसे देवरिया जिला अस्पताल भेज दिया गया। जब वह वहां पहुंचा तो उसे बीआरडी मेडिकल कालेज भेज दिया गया। बीआरडी मेडिकल कालेज से उसे वापस घर भेज दिया गया। घर लौटने पर उसके दोनों बच्चों की मौत हो गई।

जैसा कि अक्सर होता है जिला प्रशासन ने तत्काल कहा कि बच्चों की मौत कुपोषण के चलते नहीं हुई है और वे बीमारी से मरे हैं। मजदूर के घर के हालात हर तरफ से इशारा कर रहे थे कि उसके दोनों बच्चे कुपोषित थे और उसके बाद कुपोषित जन्य बीमारी के शिकार हुए।

बेटी करीना के साथ पूनम

सरकार और प्रशासन कुपोषण और भूख से बच्चों की मौत से इनकार कर अपने काम में लग गए लेकिन जब यह घटना हुई उस वक्त गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कालेज में स्थित पोषण पुनर्वास केन्द्र ( एनआरसी ) में छह कुपोषित बच्चे भर्ती थे जिनका इलाज चल रहा था। इन्ही में पूनम की की बेटी करीना भी थी जिसका उम्र के हिसाब से वजन नहीं बढ़ रहा था। पैदाइश के वक्त उसका वजन 3 किलो था लेकिन 18 महीने बाद उसका वजन 5.025 किग्रा था जबकि मानक के अनुरूप उसका वजन 10 किलो होना चाहिए। वह खून की कमी की भी शिकार थी। जब वह एनआरसी में भर्ती हुई तो उसका हीमोग्लोबिन सिर्फ 2.6 ग्राम पर डेसीलीटर था। इस कारण उसे कई बार खून चढ़ाया गया।

करीना सात नवम्बर को एनआरसी में भर्ती हुई थी। देवरिया जिले के बरहज क्षेत्र के मौनगढ़वा की निवासी पूनम का चार वर्ष का एक और बेटा है। उसकी शादी वर्ष 2009 में हुई थी और उसका पति बाहर मजदूरी करता है।

इसी तरह के कई और बच्चे वहां भर्ती थे। वर्ष 2010 से शुरू हुए इस एनआरसी के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं फिर भी यहां हर वर्ष इलाज और पोषण के लिए 300 से अधिक बच्चे भर्ती हो रहे हैं। वर्ष 2016 में यहां भर्ती बच्चों की संख्या 300 थी तो नवम्बर 2017 तक 241 बच्चे भर्ती हो चुके थे। एनआरसी में बच्चों को डाॅक्टर की सलाह के अनुसार दवाइयां और पोषक आहार निःशुल्क दिया जाता है। साथ ही मां को 50 रूपए दैनिक भत्ता दिया जाता है।

अब इस तरह के सेंटर जिलों पर भी बनाए गए हैं लेकिन इनके बारे में लोगों को ज्यादा पता नहीं है।

यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में सबसे अधिक 46.8 मिलियान बच्चे ऐसे हैं जिनका वृद्धि आयु के अनुसार नहीं हैं यानि विश्व स्वास्थ्य संगठन के बाल विकास मानक ( माइनस टू स्टैन्डर्ड डेविएशन -2एसडी या माइनस थ्री स्टैन्डर्ड डेविएशन -3एसडी ) से कम है। भारत में पांच वर्ष से कम आयु के ऐसे बच्चों की संख्या 38 फीसदी है। उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, मध्यप्रदेश, गुजरात में आयु के अनुसार विकास न होने वाले बच्चों की संख्या सबसे अधिक हैं।

उत्तर प्रदेश देश के सर्वाधिक कुपोषित बच्चों वाला राज्य है। राज्य पोषण मिशन के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में हर दस में से दो बच्चे 2.5 किलो से कम वजन के पैदा होते हैं। हर दस में से चार बच्चे कुपोषित हैं। हर दो किशोरियों में से एक खून की कमी की शिकार है। प्रदेश में 75 लाख बच्चे कम वजन के हैं तो 35 लाख बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं। प्रदेश में 95 लाख बच्चे ऐसे हैं जो गंभीर रूप से कुपोषित तो हैं ही उनकी आयु के अनुसार विकास अवरूद्ध है।

कम वजन और खून की कमी से बच्चों का शारीरिक विकास अवरूद्ध हो जाता है और बीमारियों से लड़ने की क्षमता कमजोर हो जाती है। इसलिए वे बार-बार डायरिया व एनीमिया के शिकार होते हैं। पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में मृत्यु दर इसी कारण से सबसे अधिक होती है।

कुपोषण का चक्र जल्दी टूटता नहीं बल्कि अगली पीढ़ी तक चलता रहा है। एक कुपोषित युवती शादी के बाद कुपोषित बच्चे को जन्म देती है। इस स्थिति में उसका व बच्चे की जान को खतरा बना रहता है। यूनिसेफ की रिपोर्ट कहती है कि देश की 70 फीसदी किशोरियां एनिमिक हैं और 50 फीसदी का बाॅडी मास इंडेक्स सामान्य से कम है।

देश में केरल को छोड़कर हर राज्य में शिशु मृत्यु दर आईएमआर पांच वर्ष के अन्दर बच्चों की मौत ( यू5एमआर ) अत्यधिक है। उत्तर प्रदेश की हालत तो और भी खराब है। नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे-4 2015-16 ( एनएफएचएस-4) के आंकड़े भी कुपोषण की गंभीर स्थिति को दर्शाते हैं। यह रिपोर्ट कहती है कि देश के 15 राज्यों में आधे से अधिक महिलाएं और बच्चे एनिमिक हैं।

एनएफएचएस-4 के आंकड़े बताते हैं कि यूपी में 20-24 वर्ष की वह महिलाएं जिनकी शादी 18 वर्ष से कम उम्र में हुई उनकी संख्या 21.2 फीसदी है। प्रदेश में 25.3 फीसदी ़महिलाओं का बाडी मास इंडेक्स सामान्य से कम है और  आधी से अधिक 51 फीसदी 15-49 वर्ष की गर्भवती महिलाएं खून की कमी की शिकार हैं।

 

बच्चों में कुपोषण का प्रमुख कारण एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग के साथ-साथ उन्हें जरूरी पोषक आहार का न मिल पाना प्रमुख हैं। एनएफएचस -4 के आंकड़े बताते हैं कि तीन वर्ष से कम आयु के ऐसे बच्चों की संख्या यूपी में सिर्फ 25.2 फीसदी है जिन्हें जन्म के एक घंटे के अंदर मां का दूध मिला। यूपी में एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग राष्ट्रीय औसत 54.9 फीसदी से भी कम 41.6 है।

लेकिन कुपोषण सिर्फ पोषक आहार का अभाव ही नहीं है। इसका सीधा सम्बन्ध सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता और हाईजीन से भी है। भारत में 523 मिलियन लोग टायलेट के अभाव में खुले में शौच करते हैं। सुरिक्षत पेयजल अभी भी लोगों को मयस्सर नहीं हैं। इस स्थिति से सबसे अधिक बच्चे प्रभावित होते हैं। जब तक सरकारें कुपोषण की गंभीर स्थिति को खुले दिल से स्वीकार नहीं करती हैं और कुपोषण, बच्चों की मौत उनके एजेंडे में पहले स्थान पर नहीं आता है करीना जैसे बच्चे अस्पतालों में भर्ती होते रहेंगे और खुश्बू और अजय जान गंवाते रहेंगे।

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